Friday, December 24, 2010

कितने ही लगा लो बंधन...

कितने   ही  लगा   लो   बंधन,
कितने   ही  पहरों  में   जकडो,
फूल    जो    खिले    है     तो,
खुशबू       बिखराती         है....

परेशान   कितना   हो    कोई,
गम की  हो  कैसी  भी  छाया,
अपना बच्चा  जब हँसे है  तो,
मुस्कान  आ   ही   जाती   है....

माँ   का   गुस्सा  भी  समझो,
इक     जादू       की    झप्पी,
गुस्से   में   भी    हमारा   वो,
भला    ही       चाहती       है....

भूलो   मत   अमीरी   में   भी,
कभी    ग़ुरबत     के      दिन,
दौलत     जैसे     आती     है,
वैसे   ही   चली    जाती     है....

दूर      जाने        वाले     से,
कितनी   थी   मुहब्बत   हमें,
रह  -   रहकर       आनेवाली,
उसकी   यादें    बतलाती   हैं....

कितने ही  लगा  लो   बंधन...

Wednesday, December 22, 2010

तू मेरे दिल में है आज भी

तू   मेरे   दिल   में   है   आज   भी,
साँसें  कहती  हैं...

तूने चाहा था मुझे, मैं नहीं  कहता,
यादें  कहती  हैं.....

मेरे कदमों में नहीं पहले जैसी बात,
राहें कहती हैं.....

मैं भी हो गया हूँ तन्हा, उनकी तरह,
रातें  कहती  हैं....

सहारा मिला किसी और का, तो मिला क्या,
बाहें  कहती  हैं....

वफ़ा ना कर सकेंगी, थोपो  ना  किसी  पर,
चाहें  कहती  हैं.....

(May, 2001)

Tuesday, December 14, 2010

दो नज़रिये- जिंदगी के

एक नज़रिया

मैं    खुश     नहीं,      उदास      नहीं
क्या  बात   है?     कुछ   ख़ास  नहीं

दुनिया  है,   या  इक  ढेर  गमों   का
कहीं से खुशी की इक आवाज़    नहीं

मैने     गम      खाया     है     बहुत
मुझे  अब  भूख  नहीं,  प्यास    नहीं

जी  रहा  हूँ  जिंदगी  बेमकसद  जैसे
कोई  उम्मीद  नहीं, कोई  आस  नहीं


दूसरा नज़रिया

मैं    खूब   हंसता   हूँ,     होता    हूँ    गमगीन     भी
हर  दिन   नई   है    जिंदगी,    और    बेहतरीन  भी

खुदा   ने   बख़्शी    हैं,    कितनी     नेमतें    हमको
उड़ने के लिए आकाश है, चलने के लिए  ज़मीन  भी

बंदिशें      जब      होंगी,     तब      देखा      जाएगा
आज मैं जी भर के खाता हूँ, मीठा  भी,  नमकीन  भी

तैयार    रहता  हूँ   रोज़,   नई   परवाज़    के    लिए
मैं     चुलबुला     भी      हूँ,     और     ज़हीन     भी

(आप कौन सा नज़रिया चुनेंगे?)

Wednesday, December 8, 2010

दिल को सब्र आता नहीं.....

तुम्हारे  बिना  मुस्कुराने  को  जी अब चाहता  नहीं
एक  पल   को  भी   अब  दिल  से  गम जाता  नहीं

तुम्हें   तो   हमारी   याद   भी   नहीं   आती    होगी
एक  ये  दिल  है,  जो  तुम्हें   भूल    पाता       नहीं

काम में लगे रहते हैं, दिखाने  के लिए  दुनिया को
पर  हमारा   दिल,   साथ    हमारा   निभाता  नहीं

करते  हैं  हम  इंतजार  तुम्हारा,  हर   शाम,  सच
तुम  आए  हो, कोई  झूठी  खबर  भी  सुनाता नहीं

तुमने  दूर  तक  साथ निभाने की खाईं थीं कसमें
तुम  भूल  गये  हो  हमें, दिल  को सब्र आता नहीं

Saturday, November 27, 2010

चलो फिर से बच्चे बन जायें.....

मेरा बेटा, मेरी मुस्कान को देखता है
और खिलखिलाता है
मैं उसकी और एक कदम बढ़ाता हूँ
वो मेरी और दौड़ जाता है
हम उसे कुछ भी कहें,
वो बस मुस्कुराता है, मुस्कुराता है
जब कोई चोट लगती है
उसे एक पल में भूल जाता है
उस आनंद का बयान नहीं,
जो उसे गोद में लेकर आता है
कितना अच्छा लगता है
जब अपनी भाषा में गुनगुनाता है....

कितना अच्छा हो गर
हम सब ऐसे ही बन जायें
जब भी किसी से मिलें
तो मुस्कुरायें, खिलखिलायें
कोई हमारी और एक कदम बढ़ाए तो
हम उसकी और दौड़ जायें
कोई गुस्सा भी करे तो
हम दिल जीतने वाली बात कह जायें
कोई गर दिल को चोट पहुँचाए तो
उसे एकदम भूल जायें
जब भी मिले समय तो
मस्ती में गुनगुनायें
आओ, सचमुच का जीवन जी जायें
चलो फिर से बच्चे बन जायें.....

Friday, November 19, 2010

जिंदगी कभी सहेली, कभी पहेली...

जिंदगी कभी सहेली, कभी पहेली...

कभी लगती इतनी अपनी कि,
मैं खुद ही जिंदगी हूँ...
कभी इतनी पराई कि,
मैं इसे जानता ही नहीं !

कभी इतनी खुशियों का समंदर,
कि डूब मरता हूँ इसमें...
कभी एक मरुस्थल कि,
पानी की एक बूँद को तरस जाता हूँ !

कभी ये केवल दाल-रोटी की चिंता,
तो कभी एक हसीन स्वपन,
कि कोई चिंता ही नहीं !

जिंदगी कभी प्रेमिका बनकर,
अपने आगोश में ले लेती हैं..
तो कभी विरह की अग्नि में,
जलने को छोड़ देती है !

कभी झील सी शांत,
तो कभी सागर सी क्लांत..

समझ ना सका कि क्या है जिंदगी,
अब लगता है कि यह परिवर्तन ही जिंदगी है !

Saturday, November 13, 2010

किस्मत ने ही साथ नहीं दिया....

किस्मत     ने     ही     साथ     नहीं      दिया,
हौंसले     तो     बहुत     किए     थे         मैंने...

क्या   करता   जब   दूर   होती  गयी  मंज़िल,
कदम      तो       बढ़ा      दिए      थे        मैंने...

यह  और  बात  है  कि उन्हें  पता  भी न चला,
दिल     में     तो     बसा      लिए     थे    मैंने...

गर्दिशें     बस       बढ़ती   -      बढ़ती    गयीं,
यूँ     तो      दिए     जला     लिए     थे    मैंने...

नाम सुनकर उनका जाने कहाँ से भर आई आँखें,
रात     भर     आँसू    बहा    तो   लिए   थे    मैंने...

Saturday, November 6, 2010

दिल चाहे ना चाहे, रुखसत लोग हो जाते हैं...

दिल  चाहे  ना चाहे,  रुखसत लोग  हो जाते हैं,
उठते  नहीं  कभी  भी, गहरी  नींद सो जाते हैं !

बाँध जाते हैं सभी को, बस  यादों की ज़ंजीरों में;
मिलते  हैं  फिर  हमको,  बस  वे  तस्वीरों में;
मुस्काती  तस्वीरों  को,  हम देख  रो  जाते हैं;
दिल  चाहे  ना चाहे, रुखसत लोग हो जाते हैं....

नज़र आयें जो हमें, तो उन्हें आवाज़ दे बुला लें;
एक  बार  फिर उन्हें, अपने  गले हम लगा लें;
पर सुनते हैं किसकी बातें, एक बार जो जाते हैं;
दिल  चाहे  ना चाहे, रुखसत  लोग हो जाते हैं....

एक ना एक दिन, सबको इस दुनिया से जाना है;
हर  इन्सा एक दिन जग से, हो जाता बेगाना है;
ना  जाने  कैसे-कैसे,  हम दिल को समझाते हैं;
दिल  चाहे  ना चाहे, रुखसत  लोग हो जाते  हैं....
उठते  नहीं  कभी  भी, गहरी  नींद  सो  जाते हैं.....


Thursday, October 28, 2010

अब जाना है हमने, है प्यार क्या -- एक गीत


अब    जाना   है     हमने,     है    प्यार     क्या,
एक   तड़प   है,   चुभन   है,    है    एक    नशा.....

तुम  सामने  नहीं हो, फिर  भी  नज़र आती हो,
एक      पल         भी     तो      ऐसा          नही,
जब    तुम्हारी    याद    दिल    से  जाती     हो,
कभी मुस्कुराता हूँ मैं, कभी रो सा  जाता हूँ  मैं,
यादों में आकर तुम, सचमुच बहुत तड़पाती हो,
तुम बिन एक पल  भी, हमसे  नहीं  जाता  रहा...
अब    जाना   है     हमने,     है   प्यार     क्या,
एक   तड़प   है,   चुभन   है,    है    एक    नशा.....

जब तुम मेरे पास थी, तो नींद   नहीं   आती थी,
अब तुम जब दूर हो, तो  नींद   नहीं    आती   है...
यूँ तो मैं तस्वीर तुम्हारी,  देखता   हूँ  बार   बार,
पर तस्वीर से, आँखों की प्यास कहाँ बुझ पाती है
इस तड़प की दवा  नहीं,  कुछ  भी तुम्हारे सिवा...
अब    जाना   है     हमने,      है      प्यार     क्या,
एक   तड़प   है,   चुभन   है,    है     एक     नशा.....

कभी   लगता  है  कि    जैसे   साँस   रुक   जाएगी,
मुझे अहसास नहीं था, तुमसे दूरी  इतना सताएगी,
करने छोड़ दिए हैं जतन, सुकून दिलाने के खुद को,
मैं  वाकिफ़ हूँ कोई भी चीज़,सुकून ना दिला पाएगी,
बस गुज़ारिश है तुमसे, हमेशा  मुझसे  करना वफ़ा..
अब     जाना    है      हमने,      है     प्यार      क्या,
एक    तड़प    है,    चुभन    है,     है     एक     नशा.....

Wednesday, October 20, 2010

मीनारें और बेटियाँ

आज जब देखता हूँ चारों ओर,
तो दूर-दूर तक अंत नहीं पाता,
उँची-उँची मीनारों का...

और जब देखता हूँ, जनसंख्या के आँकड़े,
तो हर वर्ष अनुपात सिकुड़ता जाता,
भारत में बेटियों का...

आज कंक्रीट की मीनारों पर,
हम अपनी सारी पूंजी लगा रहे हैं,
और कहते हैं, कि घर बना रहें हैं...

और गर्भ की बेटी को...
और गर्भ की बेटी को,
तकनीक से मिटा रहें हैं,
और सोचते हैं,
बड़े खर्च से मुक्ति पा रहें हैं...

एक पर लगाए धन को,
हम निवेश कहते हैं,
और दूसरे को मजबूरी....
कहीं यही तो नहीं,
विनाश की उल्टी धुरी...

वह दिन दूर नहीं, जब हम चारों ओर,
केवल कंक्रीट के जंगल खड़े पाएँगे...
हम उँची मीनारों पर, बड़े मकानों पर,
निवेश करते जाएँगे...
एक मकान रहने के लिए,
दस किराए के लिए बनाएँगे,
और गर्भ की बेटी को मारते रहेंगे...
और गर्भ की बेटी को मारते रहेंगे,
बचे दहेज का धन, इन मकानों पर लगायेंगे,

पर क्या,
बिना बेटियों के, इन बड़े मकानों में,
कभी कोई किल्कारी हम सुन पायेंगे ??

बढ़ती मीनारें और घटती बेटियाँ,
सचमुच चिंता की बात है,
एक से प्रक्रति ख़तरे में है,
दूसरा मानव सभ्यता का विनाश है...

आओ, दहेज प्रथा और भूर्ण हत्या को,
आप और हम समाज से मिटायें,
निवेश मीनारों पर नहीं, बेटियों पर करें,
उन्हें सबल और सुशिक्षित बनायें,
केवल चार दीवारी वाले दस मकान नहीं,
बस एक घर सुंदर सा सजायें,
जो हरी-भरी धरा हमें विरासत में मिली है,
भावी पीढ़ी को उसे वैसी ही सौंप जायें....

Sunday, October 17, 2010

यादें हैं सच्ची परछाई...


बहुत    रात   गुजर   जाने  पर  भी,  जब   नींद   ना   आई,
दिल के किसी कोने में छिपी  यादों  ने, तब आवाज़  लगाई...

कोहरा     सा        हटने       लगा,       कुछ      चेहरों    से,
कुछ   चलती  -  फिरती   तस्वीरें,    दी     साफ     दिखाई...

कुछ यादों से बन गयी,  खुद-ब-खुद मुस्कुराहट की लकीरें,
कुछ      यादों      ने,       खूब       मेरी       आँखें       रुलाई...

कितना     नायाब     होता      है,     यादों      का    ख़ज़ाना,
लूट    लो    कितना    भी,       जब      साथ     हो    तन्हाई...

वो    भी    क्या    साया   है,  जो   बस  साथ  दे   उजालों में,
हर    जगह    साथ  रहती   हैं,  "दर्द" यादें  हैं  सच्ची परछाई...

Tuesday, October 12, 2010

हमारा लगता ही क्या है, मुस्कुराने में.....

दूसरों   के   चेहरे   पर  भी,  आ  जाती  है रौनक,
हमारा    लगता    ही   क्या   है,   मुस्कुराने   में !

और  नहीं  तो कम से कम, दिल से तो पास  रहें,
रखा   ही    क्या   है,   यूँ    दूरियाँ    बनाने     में !

हटा  दो  चश्मा -ए- मतलब -ओ - मौक़ापरस्ती,
देखो फिर, लुत्फ़ है कितना, मिलने - मिलाने में !

करो   मुहब्बत,   और   उसे   कम  ना   होने  दो,
यूँ   ही  बीत जाए  ना  ज़िंदगी, रूठने-मनाने  में,

है   खुशी,   तुम्हारे  ही   इर्द - गिर्द,   ज़रा   देखो,
ख़ुदा  ने  छिपा के थोड़े  ही  रखी  है, तहख़ाने  में !

हमारा   लगता   ही   क्या   है,   मुस्कुराने   में.....

Saturday, October 9, 2010

फिर भी जिंदगी अधूरी रह गयी ....


आज  फिर   मेरी   बेखुदी,    मेरे   कानों   में  मुझसे कह गयी,
सब कुछ किया हासिल तूने, फिर भी जिंदगी  अधूरी रह गयी !

कुछ     राज़     ऐसे    थे,   जो   मुझे    खुद   से   भी  रखने  थे,
पर  मेरी   खामोश   नज़रें,   जाने     क्यूँ    सबसे   कह  गयीं !

कोशिश  बहुत की  मैनें  कि खुशियों  को हाथों  से  ना  जाने दूं,
मैं   कसता   गया   मुट्ठी  को,  वो   रेत   की   तरह  बह गयीं  !

मैं    चला    वक़्त    के    साथ    बहुत   दूर     तलक,  यूँ    तो,
पर  मेरी  रफ़्तार  एक  हद  के  बाद   उससे   पीछे   रह  गयी !

यूँ    तो    डाल    ली    मैने,    आज     में     जीने    की  आदत,
फिर  भी  एक   कसक   पुरानी   यादों   की  दिल  में  रह  गयी !


फिर भी जिंदगी  अधूरी रह गयी .....

Wednesday, October 6, 2010

ज़िंदगी कहाँ छिपी है ?

ज़िंदगी   कहाँ   छिपी   है ?

कहीं   एक     स्पर्श    में   तो   नहीं,
कहीं    ठंडे     फर्श    में   तो       नहीं,

कहीं  बैरागी के    बैराग    में   तो     नहीं,
कहीं सर्दियों में जलती  आग  में तो नहीं,

कहीं    त्योहारों,    तीज   में    तो   नहीं,
कहीं पल्लवित  होते बीज  में  तो   नहीं,

कहीं   पीपल    की    छाँव   में तो   नहीं,
कहीं सड़क से दूर वाले गाँव में तो  नहीं,

कहीं      लंबे      बांसों      में    तो  नहीं,
कहीं     बावन    ताशों    में    तो   नहीं,

कहीं बस में खिड़की वाले   सफ़र  में  तो नहीं,
कहीं दादी के कड़वे काढ़े  के असर में तो  नहीं,

कहीं  बैठे  हुए   यादों   में खो  जाने  में  तो  नहीं,
कहीं पिन्नी की पतंग बनाकर उड़ाने में तो नहीं,

कहीं     पगडंडी     पर     चलने   में  तो    नहीं,
कहीं तालाब में रपट कर  संभलने में तो  नहीं,

कहीं मछलियों को देर तक  देखने में तो  नहीं,
कहीं बेरी के  नीचे  बेर   समेटने   में  तो   नहीं,

नहीं,   नहीं,    कहीं    नहीं,
जिंदगी   यहीं  है,  बस यहीं,
आज इस पल को बना लो बस अपना,
पूरा हो जाएगा जिंदगी जीने का सपना....

Monday, October 4, 2010

फिर मुझे याद आ गया था वो....

आँख   जब   खुली,   तो   फि र  ना    लगी,
रात   फिर  मुझे,  याद   आ   गया   था  वो...

तू   भूल  जा  मुझे,  पर  मैं  जहन में हूँ तेरे,
आज   फिर   मुझे,  समझा   गया   था   वो...

आग  दीदारे-यार की,  जो बुझ गयी थी अब,
आग    फिर    वही,    दहका   गया   था  वो....

बेखुदी    मेरी,     इस     हद     तक     बढ़ी,
लगा   था   जैसे,   पास   आ   गया   था  वो.....

एक   वेहम  था  मुझे,   उससे   दूर हूँ मैं अब,
दिल    ही   में  था  मेरे,   कहाँ   गया  था वो ...

रात   फिर  मुझे,  याद   आ   गया   था  वो...

Wednesday, September 29, 2010

इस बार जब मैं गाँव गया..

इस   बार   जब   मैं   गाँव  गया,

मिट्टी में  खेलने को मचल उठा,
मेरा    बीता     हुआ    बचपन,
देखकर  गाँव  के  टूटे  घर का,
वो  कच्ची  मिट्टी  का  आँगन !

ठहर  गयी   कुछ  देर के लिए,
उस   मुंडेर   पर   मेरी   नज़र,
जिसपर  खेलती  थीं   चिड़ियाँ,
और  उनमें  होती  थी अनबन !

जिसपर    लेटकर    गुज़ारी  थीं,
गर्मियों   की   कितनी   ही   रातें,
उस कच्ची छत पर भरी दुपहरी में,
लेटने   को   हो   आया   था   मन !

हमारी     सुनहली     गाय     का,
आँगन   में    खूँटा  अभी   भी था,
बस  नहीं   थी   वो   सीधी   गाय,
और  उसकी  घंटी  की  टन-टन !

नज़रें    उस    बूढ़े    बाबा    को,
चौपाल     पर     तलाशती   थीं,
जिससे    था    मेरा,   रात   का,
और  कहानी  का,  अटूट  बंधन !


मुझे  बचपन  के  उन साथियों का,
गली     में     झुंड    नहीं     मिला,
जिनसे    होती   थी    रोज   लड़ाई,
जिनके  बिना, लगता नहीं था मन !

मैं   पक्की   सड़कों   में   देर   तक,
कच्ची    पगडंडियाँ    ढूंढता    रहा,
जो   दब   गयी   थीं   उनमें वैसे ही,
जैसे     जवानी      में       बचपन !

Tuesday, September 28, 2010

उन्होंने मुझे अकेला छोड़ दिया चौराहे पर....

उन्होंने    मुझे   अकेला   छोड़    दिया   चौराहे   पर,
देखें,   मेरी     जिंदगी    मुझे   कहाँ   ले   जाती   है !

साए   भी   साथ   रहते   हैं   बस   उजालों    में   ही,
अंधेरों   में   परछाई   भी  कहाँ   साथ  निभाती   है !

किसे     क्या     मिले     मुक़द्दर    की     बात     है,
लहरें कहीं मोती दे जाती हैं, तो कहीं तूफान लाती हैं !

साथ  हो  जब  खुशियाँ  तो वो  खुशियाँ नहीं लगती,
फिर  रह - रहकर   हमें   उनकी    यादें  सताती   हैं !

दिल   की  चोटें   भी  होती  हैं  कुछ  अजीबो-ग़रीब,
यादों   की   हवा  लगती   है,  कि  उभर  आती    हैं !

उन्होंने    मुझे   अकेला   छोड़   दिया   चौराहे   पर....

Monday, September 27, 2010

ज़िंदगी ही है ज़िंदगी का सच......

'दर्द' ने  देखा,  जाँचा,  परखा  है  जो अब  तक,
बस  यही  कि  ज़िंदगी  ही  है, ज़िंदगी का सच !

चलती   रहती   हैं   यूँही  धड़कनें   और   साँसें,
बीत    जाता    है    एक     दिन,   रोज़     बस !

इस     पर    किसी     का     अख़्तियार    कहाँ,
मिल   जाए,   बिछड़   जाए,   कहाँ,  कौन,  कब !

था     बचपन,   तो  टॉफियाँ  भी  ख़ूब  भाती  थीं,
रहा   रसगुल्ले   में   भी   कहाँ,  वो  लुत्फ़  अब !

सबको मरहम लगाने का सलीका तब ही आया,
ख़ुद   दिल    पे   खाया    गहरा,   ज़ख्म    जब !

Saturday, September 25, 2010

ग़म को दिल से निकालना चाहता हूँ....

ग़म   को    दिल  से   निकालना   चाहता  हूँ,
मैं अपने आपको फिर से सँभालना चाहता हूँ....

मन  की कुंठा को दबाना  चाहता  हूँ  हँसी  से,
हँसी  को   कुंठा   से   निकालना   चाहता   हूँ....

थक    गया   हूँ   बैठे - बैठे    चौराहों     पर,
अब  एक  नयी  राह   निकालना   चाहता  हूँ....

जो      चहचहाए       सदा      खुशियों     से,
मन  में   ऐसा    पंछी    पालना    चाहता  हूँ....

मैं  सबसे, सब  मुझसे  मिलकर मुस्कुरायें,
सबसे   ऐसी   डोर   बांधना   चाहता   हूँ....

मैं  सबको  अपना सा बना ना सकूँ शायद,
मैं  खुद  को  सबके  लिए  ढालना  चाहता  हूँ....

ग़म   को   दिल   से   निकालना   चाहता  हूँ....

Friday, September 24, 2010

दोस्त......

मुझे जब जब लगा,
कि मैं मुश्किलों से घिर गया हूँ,
लाख कोशिश करने पर भी,
जब मैं बिखर-बिखर गया हूँ,
जब रुकावटें ही रुकावटें दिखती हैं,
मैं जहाँ भी जिधर गया हूँ,
मंज़िलों तक जाने वाले रास्तों पर,
जब मैं दूर तक बिछड़ गया हूँ....

तब तब अपने कंधे पर,
मैंने एक हाथ महसूस किया,
अनेक कमज़ोरियों में,
जिसने मुझे मज़बूत किया,
एक साए की तरह,
जिसे अपने करीब पाया मैंने,
वो कोई और नहीं,
वो कोई और नहीं,
मेरा दोस्त था...

उसे दोस्त कहना,
जाने क्यूँ अटपटा सा लगता है,
वो दोस्त नहीं है,
वो एक देवता है, एक देवता है......

Thursday, September 23, 2010

इक तरफ़ा मोहब्बत.....

माना इक तरफ़ा मोहब्बत को मोहब्बत नहीं कहते,
माना इक तरफ़ा मोहब्बत को मोहब्बत नहीं कहते,
मगर मोहब्बत की वो कौन सी तड़प है,
जिसे हम नहीं सहते.....

उनकी सूरत देखकर हमें भी चैन मिलता है,
उनके चले जाने पर हमारा भी दम निकलता है..
हमारे भी खाबों में वो रोज आते हैं,
उनके ख्याल हमें भी तड़पाते है...
उनका नाम हम भी मिटाते हैं लिखकर,
हम भी लगा लेते हैं उनकी तस्वीर सीने से तड़प कर...

हम कब उन्हें याद नहीं करते?
वो कब हमारे दिल में नहीं रहते?

माना इक तरफ़ा मोहब्बत को मोहब्बत नहीं कहते,
मगर मोहब्बत की वो कौन सी तड़प है,
जिसे हम नहीं सहते.....

Wednesday, September 22, 2010

पत्थर के बुत ही आख़िर रब बनते हैं....

सपने  खुली  आँखों  के  ही  हक़ीकत बनते हैं,
 नींद में देखे गये सपने किसी के कब बनते हैं....

इक    वेहम     है     किसी   का   हो   जाना,
वरना   इन्सा   किसी   के   कब   बनते   हैं...

लग   जाता  है   पूरी  जिंदगी  का  पसीना,
ईमानदारी     से    घर    तब     बनते   हैं.....

मुफ़लिसी   परखती    है     सच्चे       साथी,
अमीरी   में   तो   यार   सब    बनते    हैं......

जिंदगी   देने   वाले   बन  जाते  हैं  बोझ,
पत्थर   के   बुत   ही  आख़िर  रब   बनते   हैं....

Tuesday, September 21, 2010

तो अच्छा होता.....


उनसे     होती    कुछ   और   बात, तो  अच्छा  होता
कुछ देर और चलती वो मुलाकात, तो  अच्छा  होता

उनकी  ही   सूरत   को,  मैं  रखता   था   आँखों    में
उनका   ही  नाम  लिखकर, मैं  रखता  था  हाथों  में
वो  भी   समझते   मेरे  ज़ज्बात,  तो  अच्छा   होता

उस  एक   पल  का  ही,  सारे  दिन   मे  इंतज़ार   होता  था
गुजरते  हुए  उनकी  गली  में, जब  उनका  दीदार  होता था
काश, होता मेरा चेहरा भी उनके लिए ख़ास,तो अच्छा होता

उनकी    हर    झलक,    मेरे   लिए   याद     बन    गयी
उनकी एक मुस्कान, मेरे  लिए  तख्तो  ताज़  बन  गयी
उनके दिल में भी होता गर ये अहसास, तो अच्छा होता

मैंने   उस   खुदा   से,  कहाँ   कुछ   ज़्यादा    माँगा   था
मैंने कहाँ फलक माँगा था,कहाँ जमी में साझा माँगा था
बस  होता  मेरे  हाथ में उनका  हाथ,  तो  अच्छा   होता

उनसे   होती   कुछ   और   बात,   तो    अच्छा    होता
कुछ देर और चलती वो  मुलाकात,  तो  अच्छा   होता 

Sunday, September 19, 2010

संघर्ष और ख्वाहिशें

संघर्ष और ख्वाहिशें

वक़्त की सलाई से,
जब मैंने बीते दिनों की चादर बुनी,
अपने बेताब से मन की,
जब मैंने तन्हाई में बातें सुनी,
तो पाया, मैंने संघर्ष बहुत किया,
पर अपनी ख़्वाहिशों को पाता गया,
कुछ ख्वाहिशें अधूरी भी रहीं,
पर लगता है अब,
वह सब हुआ था सही,
हो सकता है उन ख़्वाहिशों को पूरा कर,
मैं अधूरा रह जाता,
उन ख़्वाहिशों की मंज़िलों से जुड़ता तो,
शायद यहाँ नहीं पाता,
जहाँ गया हूँ,
वही तो मंज़िल है नहीं,
मुझे बढ़ाते रहना है कदम,
मुझे जाना है अभी और कहीं,
यही है ज़िंदगी,
जो संघर्ष और ख़्वाहिशों में चलती रहेगी,
वक़्त की सलाई,
आने वाले दिनों की चादर बुनेगी....

Saturday, September 18, 2010

लाख कोशिश करने पर भी...

लाख़    कोशिश   करने     पर     भी,
तेरी  यादों  से  दूर   मैं  जा ना  सका...

भुला    दी    मैंने    दुनिया     सारी,
बस  तुझको    मैं     भुला  ना    सका....

हर  जगह  तुझे  मेरी  आँखें  ढूढ़ती  हैं,
पर  शहर  में तुझे  कहीं भी पा ना सका....

तडपाया है जितना तेरे ख्वाबों  ने दिल को,
कोई भी ख्वाब मुझे इतना तडपा ना सका...

ज़िक्र   आने   पर  तेरा  भर  आई  आँखें,
तुझसे  जुदाई  का  दर्द  मैं  छिपा ना सका....

लाख    कोशिश   करने   पर  भी...