Saturday, September 25, 2010

ग़म को दिल से निकालना चाहता हूँ....

ग़म   को    दिल  से   निकालना   चाहता  हूँ,
मैं अपने आपको फिर से सँभालना चाहता हूँ....

मन  की कुंठा को दबाना  चाहता  हूँ  हँसी  से,
हँसी  को   कुंठा   से   निकालना   चाहता   हूँ....

थक    गया   हूँ   बैठे - बैठे    चौराहों     पर,
अब  एक  नयी  राह   निकालना   चाहता  हूँ....

जो      चहचहाए       सदा      खुशियों     से,
मन  में   ऐसा    पंछी    पालना    चाहता  हूँ....

मैं  सबसे, सब  मुझसे  मिलकर मुस्कुरायें,
सबसे   ऐसी   डोर   बांधना   चाहता   हूँ....

मैं  सबको  अपना सा बना ना सकूँ शायद,
मैं  खुद  को  सबके  लिए  ढालना  चाहता  हूँ....

ग़म   को   दिल   से   निकालना   चाहता  हूँ....

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