आज फिर मेरी बेखुदी, मेरे कानों में मुझसे कह गयी,
सब कुछ किया हासिल तूने, फिर भी जिंदगी अधूरी रह गयी !
कुछ राज़ ऐसे थे, जो मुझे खुद से भी रखने थे,
पर मेरी खामोश नज़रें, जाने क्यूँ सबसे कह गयीं !
कोशिश बहुत की मैनें कि खुशियों को हाथों से ना जाने दूं,
मैं कसता गया मुट्ठी को, वो रेत की तरह बह गयीं !
मैं चला वक़्त के साथ बहुत दूर तलक, यूँ तो,
पर मेरी रफ़्तार एक हद के बाद उससे पीछे रह गयी !
यूँ तो डाल ली मैने, आज में जीने की आदत,
फिर भी एक कसक पुरानी यादों की दिल में रह गयी !
फिर भी जिंदगी अधूरी रह गयी .....

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