Saturday, October 9, 2010

फिर भी जिंदगी अधूरी रह गयी ....


आज  फिर   मेरी   बेखुदी,    मेरे   कानों   में  मुझसे कह गयी,
सब कुछ किया हासिल तूने, फिर भी जिंदगी  अधूरी रह गयी !

कुछ     राज़     ऐसे    थे,   जो   मुझे    खुद   से   भी  रखने  थे,
पर  मेरी   खामोश   नज़रें,   जाने     क्यूँ    सबसे   कह  गयीं !

कोशिश  बहुत की  मैनें  कि खुशियों  को हाथों  से  ना  जाने दूं,
मैं   कसता   गया   मुट्ठी  को,  वो   रेत   की   तरह  बह गयीं  !

मैं    चला    वक़्त    के    साथ    बहुत   दूर     तलक,  यूँ    तो,
पर  मेरी  रफ़्तार  एक  हद  के  बाद   उससे   पीछे   रह  गयी !

यूँ    तो    डाल    ली    मैने,    आज     में     जीने    की  आदत,
फिर  भी  एक   कसक   पुरानी   यादों   की  दिल  में  रह  गयी !


फिर भी जिंदगी  अधूरी रह गयी .....

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