Tuesday, October 12, 2010

हमारा लगता ही क्या है, मुस्कुराने में.....

दूसरों   के   चेहरे   पर  भी,  आ  जाती  है रौनक,
हमारा    लगता    ही   क्या   है,   मुस्कुराने   में !

और  नहीं  तो कम से कम, दिल से तो पास  रहें,
रखा   ही    क्या   है,   यूँ    दूरियाँ    बनाने     में !

हटा  दो  चश्मा -ए- मतलब -ओ - मौक़ापरस्ती,
देखो फिर, लुत्फ़ है कितना, मिलने - मिलाने में !

करो   मुहब्बत,   और   उसे   कम  ना   होने  दो,
यूँ   ही  बीत जाए  ना  ज़िंदगी, रूठने-मनाने  में,

है   खुशी,   तुम्हारे  ही   इर्द - गिर्द,   ज़रा   देखो,
ख़ुदा  ने  छिपा के थोड़े  ही  रखी  है, तहख़ाने  में !

हमारा   लगता   ही   क्या   है,   मुस्कुराने   में.....

2 comments:

AMOL said...

Bahut Badhiya,

Thanks

Jitendra

Arti said...

Apki sunder kavita aur urdu shabd gyan- kya baat hai. Kahan chupa rakha tha ye sab. Lucky man! hum to Bahi Khate me hi kho gaye lagte hain.