Tuesday, July 26, 2011

मेरे मन तू आज उदास न हो...

मेरे मन तू आज उदास न हो...

आज   वो   कौन  सी चीज़ है,
जो    तेरे      पास     न    हो,
मेरे मन तू आज उदास न हो...

तेरे     पास    तेरा    प्यार   है,
एक हंसता, खेलता परिवार है;
वे   सारी     चीज़ें   हैं,
जिन्हे तू चाहता  था;
जिनके    लिए     तू,
पसीना   बहाता  था;

हाँ,   हो   सकता    है,
मंज़िल पर पहुँच कर,
तू  राहें  तलाशता हो--

ये    सच     है    कि-
मंज़िल पर  पहुँचना,
आसान     नहीं   है;
पर तू क्यूँ यह सोचता है कि-
मंज़िल   पर    पहुँच  कर,
तेरे पास कोई काम नहीं है...

जो किया है तूने हासिल,
उसे  कायम  रखना  भी,
एक  कठिन   रास्ता  है;
है         इंसान        वही,
जो गमों के बीच भी हंसता है...

तू  चला  चल  अपनी  राह  पर,
चाहे कोई भी तेरे साथ हो न हो..

मेरे मन तू आज उदास  न  हो...

Friday, July 15, 2011

सोचो - काश ऐसा होता...

सोचो - काश ऐसा होता,
हम बूढ़े पहले होते और बच्चे बाद में..

अपने जन्म के समय,
हममें से कुछ लेटे होते कब्र में,
और कुछ सने होते राख में..

लोग हमें लेकर जाते घर,
राम नाम सत्य कहते हुए..
घर की औरतें स्वागत करतीं हमारा,
छाती पीट-पीटकर रोते हुए...

घर जाते ही पड़ जाते हम,
कोने  में पड़ी चारपाई पर..
फिर हमारी दिनचर्या शुरू होती,
एक छड़ी के सहारे और दवाई पर...

कुछ साल बाद कोई बताता हमें,
कि अब हम जवान हो रहें हैं..
हमारे बाल जो पहले सफेद थे,
अब काले तमाम हो रहे हैं....

हमारी हरकतें फिर,
और बढ़ती जाती...
आस-पड़ोस की बुढ़ियों पर,
हमारी नज़र जाती...

घर वालों से करते सिफारिश,
फलाँ बुढ़िया से करो रिश्ते की बात...
इधर हम जवान हो रहे हैं,
वो भी जवान हो जाएगी, दो-चार साल बाद...

शादी के बाद,
शुरू होते कॉलेज के दिन..
सीधे एम. ए. बी. ए. में
होता एड्मिशन,

पढ़ाई करते कालिदास शेक्सपीएर से,
अ आ इ ई, ए बी सी डी तक..
धीरे धीरे छोड़ देते,
पान गुटखा सिगरेट बीड़ी तक..

जैसे जैसे घटती हमारी उम्र,
हमारी नादानियाँ और बढ़ती जाती...
समय बीतता गोली, पतंग में,
पॉपकिन चॉकलेट हमें खूब भाती..

उसके बाद छोड़ देते खाना,
बस दूध पर हम आ जाते...
और एक दिन अचानक,
माँ को होती प्रसव पीड़ा,
और हम गर्भ में समा जाते....