Wednesday, September 29, 2010

इस बार जब मैं गाँव गया..

इस   बार   जब   मैं   गाँव  गया,

मिट्टी में  खेलने को मचल उठा,
मेरा    बीता     हुआ    बचपन,
देखकर  गाँव  के  टूटे  घर का,
वो  कच्ची  मिट्टी  का  आँगन !

ठहर  गयी   कुछ  देर के लिए,
उस   मुंडेर   पर   मेरी   नज़र,
जिसपर  खेलती  थीं   चिड़ियाँ,
और  उनमें  होती  थी अनबन !

जिसपर    लेटकर    गुज़ारी  थीं,
गर्मियों   की   कितनी   ही   रातें,
उस कच्ची छत पर भरी दुपहरी में,
लेटने   को   हो   आया   था   मन !

हमारी     सुनहली     गाय     का,
आँगन   में    खूँटा  अभी   भी था,
बस  नहीं   थी   वो   सीधी   गाय,
और  उसकी  घंटी  की  टन-टन !

नज़रें    उस    बूढ़े    बाबा    को,
चौपाल     पर     तलाशती   थीं,
जिससे    था    मेरा,   रात   का,
और  कहानी  का,  अटूट  बंधन !


मुझे  बचपन  के  उन साथियों का,
गली     में     झुंड    नहीं     मिला,
जिनसे    होती   थी    रोज   लड़ाई,
जिनके  बिना, लगता नहीं था मन !

मैं   पक्की   सड़कों   में   देर   तक,
कच्ची    पगडंडियाँ    ढूंढता    रहा,
जो   दब   गयी   थीं   उनमें वैसे ही,
जैसे     जवानी      में       बचपन !

Tuesday, September 28, 2010

उन्होंने मुझे अकेला छोड़ दिया चौराहे पर....

उन्होंने    मुझे   अकेला   छोड़    दिया   चौराहे   पर,
देखें,   मेरी     जिंदगी    मुझे   कहाँ   ले   जाती   है !

साए   भी   साथ   रहते   हैं   बस   उजालों    में   ही,
अंधेरों   में   परछाई   भी  कहाँ   साथ  निभाती   है !

किसे     क्या     मिले     मुक़द्दर    की     बात     है,
लहरें कहीं मोती दे जाती हैं, तो कहीं तूफान लाती हैं !

साथ  हो  जब  खुशियाँ  तो वो  खुशियाँ नहीं लगती,
फिर  रह - रहकर   हमें   उनकी    यादें  सताती   हैं !

दिल   की  चोटें   भी  होती  हैं  कुछ  अजीबो-ग़रीब,
यादों   की   हवा  लगती   है,  कि  उभर  आती    हैं !

उन्होंने    मुझे   अकेला   छोड़   दिया   चौराहे   पर....

Monday, September 27, 2010

ज़िंदगी ही है ज़िंदगी का सच......

'दर्द' ने  देखा,  जाँचा,  परखा  है  जो अब  तक,
बस  यही  कि  ज़िंदगी  ही  है, ज़िंदगी का सच !

चलती   रहती   हैं   यूँही  धड़कनें   और   साँसें,
बीत    जाता    है    एक     दिन,   रोज़     बस !

इस     पर    किसी     का     अख़्तियार    कहाँ,
मिल   जाए,   बिछड़   जाए,   कहाँ,  कौन,  कब !

था     बचपन,   तो  टॉफियाँ  भी  ख़ूब  भाती  थीं,
रहा   रसगुल्ले   में   भी   कहाँ,  वो  लुत्फ़  अब !

सबको मरहम लगाने का सलीका तब ही आया,
ख़ुद   दिल    पे   खाया    गहरा,   ज़ख्म    जब !

Saturday, September 25, 2010

ग़म को दिल से निकालना चाहता हूँ....

ग़म   को    दिल  से   निकालना   चाहता  हूँ,
मैं अपने आपको फिर से सँभालना चाहता हूँ....

मन  की कुंठा को दबाना  चाहता  हूँ  हँसी  से,
हँसी  को   कुंठा   से   निकालना   चाहता   हूँ....

थक    गया   हूँ   बैठे - बैठे    चौराहों     पर,
अब  एक  नयी  राह   निकालना   चाहता  हूँ....

जो      चहचहाए       सदा      खुशियों     से,
मन  में   ऐसा    पंछी    पालना    चाहता  हूँ....

मैं  सबसे, सब  मुझसे  मिलकर मुस्कुरायें,
सबसे   ऐसी   डोर   बांधना   चाहता   हूँ....

मैं  सबको  अपना सा बना ना सकूँ शायद,
मैं  खुद  को  सबके  लिए  ढालना  चाहता  हूँ....

ग़म   को   दिल   से   निकालना   चाहता  हूँ....

Friday, September 24, 2010

दोस्त......

मुझे जब जब लगा,
कि मैं मुश्किलों से घिर गया हूँ,
लाख कोशिश करने पर भी,
जब मैं बिखर-बिखर गया हूँ,
जब रुकावटें ही रुकावटें दिखती हैं,
मैं जहाँ भी जिधर गया हूँ,
मंज़िलों तक जाने वाले रास्तों पर,
जब मैं दूर तक बिछड़ गया हूँ....

तब तब अपने कंधे पर,
मैंने एक हाथ महसूस किया,
अनेक कमज़ोरियों में,
जिसने मुझे मज़बूत किया,
एक साए की तरह,
जिसे अपने करीब पाया मैंने,
वो कोई और नहीं,
वो कोई और नहीं,
मेरा दोस्त था...

उसे दोस्त कहना,
जाने क्यूँ अटपटा सा लगता है,
वो दोस्त नहीं है,
वो एक देवता है, एक देवता है......

Thursday, September 23, 2010

इक तरफ़ा मोहब्बत.....

माना इक तरफ़ा मोहब्बत को मोहब्बत नहीं कहते,
माना इक तरफ़ा मोहब्बत को मोहब्बत नहीं कहते,
मगर मोहब्बत की वो कौन सी तड़प है,
जिसे हम नहीं सहते.....

उनकी सूरत देखकर हमें भी चैन मिलता है,
उनके चले जाने पर हमारा भी दम निकलता है..
हमारे भी खाबों में वो रोज आते हैं,
उनके ख्याल हमें भी तड़पाते है...
उनका नाम हम भी मिटाते हैं लिखकर,
हम भी लगा लेते हैं उनकी तस्वीर सीने से तड़प कर...

हम कब उन्हें याद नहीं करते?
वो कब हमारे दिल में नहीं रहते?

माना इक तरफ़ा मोहब्बत को मोहब्बत नहीं कहते,
मगर मोहब्बत की वो कौन सी तड़प है,
जिसे हम नहीं सहते.....

Wednesday, September 22, 2010

पत्थर के बुत ही आख़िर रब बनते हैं....

सपने  खुली  आँखों  के  ही  हक़ीकत बनते हैं,
 नींद में देखे गये सपने किसी के कब बनते हैं....

इक    वेहम     है     किसी   का   हो   जाना,
वरना   इन्सा   किसी   के   कब   बनते   हैं...

लग   जाता  है   पूरी  जिंदगी  का  पसीना,
ईमानदारी     से    घर    तब     बनते   हैं.....

मुफ़लिसी   परखती    है     सच्चे       साथी,
अमीरी   में   तो   यार   सब    बनते    हैं......

जिंदगी   देने   वाले   बन  जाते  हैं  बोझ,
पत्थर   के   बुत   ही  आख़िर  रब   बनते   हैं....

Tuesday, September 21, 2010

तो अच्छा होता.....


उनसे     होती    कुछ   और   बात, तो  अच्छा  होता
कुछ देर और चलती वो मुलाकात, तो  अच्छा  होता

उनकी  ही   सूरत   को,  मैं  रखता   था   आँखों    में
उनका   ही  नाम  लिखकर, मैं  रखता  था  हाथों  में
वो  भी   समझते   मेरे  ज़ज्बात,  तो  अच्छा   होता

उस  एक   पल  का  ही,  सारे  दिन   मे  इंतज़ार   होता  था
गुजरते  हुए  उनकी  गली  में, जब  उनका  दीदार  होता था
काश, होता मेरा चेहरा भी उनके लिए ख़ास,तो अच्छा होता

उनकी    हर    झलक,    मेरे   लिए   याद     बन    गयी
उनकी एक मुस्कान, मेरे  लिए  तख्तो  ताज़  बन  गयी
उनके दिल में भी होता गर ये अहसास, तो अच्छा होता

मैंने   उस   खुदा   से,  कहाँ   कुछ   ज़्यादा    माँगा   था
मैंने कहाँ फलक माँगा था,कहाँ जमी में साझा माँगा था
बस  होता  मेरे  हाथ में उनका  हाथ,  तो  अच्छा   होता

उनसे   होती   कुछ   और   बात,   तो    अच्छा    होता
कुछ देर और चलती वो  मुलाकात,  तो  अच्छा   होता 

Sunday, September 19, 2010

संघर्ष और ख्वाहिशें

संघर्ष और ख्वाहिशें

वक़्त की सलाई से,
जब मैंने बीते दिनों की चादर बुनी,
अपने बेताब से मन की,
जब मैंने तन्हाई में बातें सुनी,
तो पाया, मैंने संघर्ष बहुत किया,
पर अपनी ख़्वाहिशों को पाता गया,
कुछ ख्वाहिशें अधूरी भी रहीं,
पर लगता है अब,
वह सब हुआ था सही,
हो सकता है उन ख़्वाहिशों को पूरा कर,
मैं अधूरा रह जाता,
उन ख़्वाहिशों की मंज़िलों से जुड़ता तो,
शायद यहाँ नहीं पाता,
जहाँ गया हूँ,
वही तो मंज़िल है नहीं,
मुझे बढ़ाते रहना है कदम,
मुझे जाना है अभी और कहीं,
यही है ज़िंदगी,
जो संघर्ष और ख़्वाहिशों में चलती रहेगी,
वक़्त की सलाई,
आने वाले दिनों की चादर बुनेगी....

Saturday, September 18, 2010

लाख कोशिश करने पर भी...

लाख़    कोशिश   करने     पर     भी,
तेरी  यादों  से  दूर   मैं  जा ना  सका...

भुला    दी    मैंने    दुनिया     सारी,
बस  तुझको    मैं     भुला  ना    सका....

हर  जगह  तुझे  मेरी  आँखें  ढूढ़ती  हैं,
पर  शहर  में तुझे  कहीं भी पा ना सका....

तडपाया है जितना तेरे ख्वाबों  ने दिल को,
कोई भी ख्वाब मुझे इतना तडपा ना सका...

ज़िक्र   आने   पर  तेरा  भर  आई  आँखें,
तुझसे  जुदाई  का  दर्द  मैं  छिपा ना सका....

लाख    कोशिश   करने   पर  भी...