Thursday, October 28, 2010

अब जाना है हमने, है प्यार क्या -- एक गीत


अब    जाना   है     हमने,     है    प्यार     क्या,
एक   तड़प   है,   चुभन   है,    है    एक    नशा.....

तुम  सामने  नहीं हो, फिर  भी  नज़र आती हो,
एक      पल         भी     तो      ऐसा          नही,
जब    तुम्हारी    याद    दिल    से  जाती     हो,
कभी मुस्कुराता हूँ मैं, कभी रो सा  जाता हूँ  मैं,
यादों में आकर तुम, सचमुच बहुत तड़पाती हो,
तुम बिन एक पल  भी, हमसे  नहीं  जाता  रहा...
अब    जाना   है     हमने,     है   प्यार     क्या,
एक   तड़प   है,   चुभन   है,    है    एक    नशा.....

जब तुम मेरे पास थी, तो नींद   नहीं   आती थी,
अब तुम जब दूर हो, तो  नींद   नहीं    आती   है...
यूँ तो मैं तस्वीर तुम्हारी,  देखता   हूँ  बार   बार,
पर तस्वीर से, आँखों की प्यास कहाँ बुझ पाती है
इस तड़प की दवा  नहीं,  कुछ  भी तुम्हारे सिवा...
अब    जाना   है     हमने,      है      प्यार     क्या,
एक   तड़प   है,   चुभन   है,    है     एक     नशा.....

कभी   लगता  है  कि    जैसे   साँस   रुक   जाएगी,
मुझे अहसास नहीं था, तुमसे दूरी  इतना सताएगी,
करने छोड़ दिए हैं जतन, सुकून दिलाने के खुद को,
मैं  वाकिफ़ हूँ कोई भी चीज़,सुकून ना दिला पाएगी,
बस गुज़ारिश है तुमसे, हमेशा  मुझसे  करना वफ़ा..
अब     जाना    है      हमने,      है     प्यार      क्या,
एक    तड़प    है,    चुभन    है,     है     एक     नशा.....

Wednesday, October 20, 2010

मीनारें और बेटियाँ

आज जब देखता हूँ चारों ओर,
तो दूर-दूर तक अंत नहीं पाता,
उँची-उँची मीनारों का...

और जब देखता हूँ, जनसंख्या के आँकड़े,
तो हर वर्ष अनुपात सिकुड़ता जाता,
भारत में बेटियों का...

आज कंक्रीट की मीनारों पर,
हम अपनी सारी पूंजी लगा रहे हैं,
और कहते हैं, कि घर बना रहें हैं...

और गर्भ की बेटी को...
और गर्भ की बेटी को,
तकनीक से मिटा रहें हैं,
और सोचते हैं,
बड़े खर्च से मुक्ति पा रहें हैं...

एक पर लगाए धन को,
हम निवेश कहते हैं,
और दूसरे को मजबूरी....
कहीं यही तो नहीं,
विनाश की उल्टी धुरी...

वह दिन दूर नहीं, जब हम चारों ओर,
केवल कंक्रीट के जंगल खड़े पाएँगे...
हम उँची मीनारों पर, बड़े मकानों पर,
निवेश करते जाएँगे...
एक मकान रहने के लिए,
दस किराए के लिए बनाएँगे,
और गर्भ की बेटी को मारते रहेंगे...
और गर्भ की बेटी को मारते रहेंगे,
बचे दहेज का धन, इन मकानों पर लगायेंगे,

पर क्या,
बिना बेटियों के, इन बड़े मकानों में,
कभी कोई किल्कारी हम सुन पायेंगे ??

बढ़ती मीनारें और घटती बेटियाँ,
सचमुच चिंता की बात है,
एक से प्रक्रति ख़तरे में है,
दूसरा मानव सभ्यता का विनाश है...

आओ, दहेज प्रथा और भूर्ण हत्या को,
आप और हम समाज से मिटायें,
निवेश मीनारों पर नहीं, बेटियों पर करें,
उन्हें सबल और सुशिक्षित बनायें,
केवल चार दीवारी वाले दस मकान नहीं,
बस एक घर सुंदर सा सजायें,
जो हरी-भरी धरा हमें विरासत में मिली है,
भावी पीढ़ी को उसे वैसी ही सौंप जायें....

Sunday, October 17, 2010

यादें हैं सच्ची परछाई...


बहुत    रात   गुजर   जाने  पर  भी,  जब   नींद   ना   आई,
दिल के किसी कोने में छिपी  यादों  ने, तब आवाज़  लगाई...

कोहरा     सा        हटने       लगा,       कुछ      चेहरों    से,
कुछ   चलती  -  फिरती   तस्वीरें,    दी     साफ     दिखाई...

कुछ यादों से बन गयी,  खुद-ब-खुद मुस्कुराहट की लकीरें,
कुछ      यादों      ने,       खूब       मेरी       आँखें       रुलाई...

कितना     नायाब     होता      है,     यादों      का    ख़ज़ाना,
लूट    लो    कितना    भी,       जब      साथ     हो    तन्हाई...

वो    भी    क्या    साया   है,  जो   बस  साथ  दे   उजालों में,
हर    जगह    साथ  रहती   हैं,  "दर्द" यादें  हैं  सच्ची परछाई...

Tuesday, October 12, 2010

हमारा लगता ही क्या है, मुस्कुराने में.....

दूसरों   के   चेहरे   पर  भी,  आ  जाती  है रौनक,
हमारा    लगता    ही   क्या   है,   मुस्कुराने   में !

और  नहीं  तो कम से कम, दिल से तो पास  रहें,
रखा   ही    क्या   है,   यूँ    दूरियाँ    बनाने     में !

हटा  दो  चश्मा -ए- मतलब -ओ - मौक़ापरस्ती,
देखो फिर, लुत्फ़ है कितना, मिलने - मिलाने में !

करो   मुहब्बत,   और   उसे   कम  ना   होने  दो,
यूँ   ही  बीत जाए  ना  ज़िंदगी, रूठने-मनाने  में,

है   खुशी,   तुम्हारे  ही   इर्द - गिर्द,   ज़रा   देखो,
ख़ुदा  ने  छिपा के थोड़े  ही  रखी  है, तहख़ाने  में !

हमारा   लगता   ही   क्या   है,   मुस्कुराने   में.....

Saturday, October 9, 2010

फिर भी जिंदगी अधूरी रह गयी ....


आज  फिर   मेरी   बेखुदी,    मेरे   कानों   में  मुझसे कह गयी,
सब कुछ किया हासिल तूने, फिर भी जिंदगी  अधूरी रह गयी !

कुछ     राज़     ऐसे    थे,   जो   मुझे    खुद   से   भी  रखने  थे,
पर  मेरी   खामोश   नज़रें,   जाने     क्यूँ    सबसे   कह  गयीं !

कोशिश  बहुत की  मैनें  कि खुशियों  को हाथों  से  ना  जाने दूं,
मैं   कसता   गया   मुट्ठी  को,  वो   रेत   की   तरह  बह गयीं  !

मैं    चला    वक़्त    के    साथ    बहुत   दूर     तलक,  यूँ    तो,
पर  मेरी  रफ़्तार  एक  हद  के  बाद   उससे   पीछे   रह  गयी !

यूँ    तो    डाल    ली    मैने,    आज     में     जीने    की  आदत,
फिर  भी  एक   कसक   पुरानी   यादों   की  दिल  में  रह  गयी !


फिर भी जिंदगी  अधूरी रह गयी .....

Wednesday, October 6, 2010

ज़िंदगी कहाँ छिपी है ?

ज़िंदगी   कहाँ   छिपी   है ?

कहीं   एक     स्पर्श    में   तो   नहीं,
कहीं    ठंडे     फर्श    में   तो       नहीं,

कहीं  बैरागी के    बैराग    में   तो     नहीं,
कहीं सर्दियों में जलती  आग  में तो नहीं,

कहीं    त्योहारों,    तीज   में    तो   नहीं,
कहीं पल्लवित  होते बीज  में  तो   नहीं,

कहीं   पीपल    की    छाँव   में तो   नहीं,
कहीं सड़क से दूर वाले गाँव में तो  नहीं,

कहीं      लंबे      बांसों      में    तो  नहीं,
कहीं     बावन    ताशों    में    तो   नहीं,

कहीं बस में खिड़की वाले   सफ़र  में  तो नहीं,
कहीं दादी के कड़वे काढ़े  के असर में तो  नहीं,

कहीं  बैठे  हुए   यादों   में खो  जाने  में  तो  नहीं,
कहीं पिन्नी की पतंग बनाकर उड़ाने में तो नहीं,

कहीं     पगडंडी     पर     चलने   में  तो    नहीं,
कहीं तालाब में रपट कर  संभलने में तो  नहीं,

कहीं मछलियों को देर तक  देखने में तो  नहीं,
कहीं बेरी के  नीचे  बेर   समेटने   में  तो   नहीं,

नहीं,   नहीं,    कहीं    नहीं,
जिंदगी   यहीं  है,  बस यहीं,
आज इस पल को बना लो बस अपना,
पूरा हो जाएगा जिंदगी जीने का सपना....

Monday, October 4, 2010

फिर मुझे याद आ गया था वो....

आँख   जब   खुली,   तो   फि र  ना    लगी,
रात   फिर  मुझे,  याद   आ   गया   था  वो...

तू   भूल  जा  मुझे,  पर  मैं  जहन में हूँ तेरे,
आज   फिर   मुझे,  समझा   गया   था   वो...

आग  दीदारे-यार की,  जो बुझ गयी थी अब,
आग    फिर    वही,    दहका   गया   था  वो....

बेखुदी    मेरी,     इस     हद     तक     बढ़ी,
लगा   था   जैसे,   पास   आ   गया   था  वो.....

एक   वेहम  था  मुझे,   उससे   दूर हूँ मैं अब,
दिल    ही   में  था  मेरे,   कहाँ   गया  था वो ...

रात   फिर  मुझे,  याद   आ   गया   था  वो...