इक वेहम है किसी का हो जाना,
वरना इन्सा किसी के कब बनते हैं...
लग जाता है पूरी जिंदगी का पसीना,
ईमानदारी से घर तब बनते हैं.....
मुफ़लिसी परखती है सच्चे साथी,
अमीरी में तो यार सब बनते हैं......
जिंदगी देने वाले बन जाते हैं बोझ,
पत्थर के बुत ही आख़िर रब बनते हैं....

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