Wednesday, October 6, 2010

ज़िंदगी कहाँ छिपी है ?

ज़िंदगी   कहाँ   छिपी   है ?

कहीं   एक     स्पर्श    में   तो   नहीं,
कहीं    ठंडे     फर्श    में   तो       नहीं,

कहीं  बैरागी के    बैराग    में   तो     नहीं,
कहीं सर्दियों में जलती  आग  में तो नहीं,

कहीं    त्योहारों,    तीज   में    तो   नहीं,
कहीं पल्लवित  होते बीज  में  तो   नहीं,

कहीं   पीपल    की    छाँव   में तो   नहीं,
कहीं सड़क से दूर वाले गाँव में तो  नहीं,

कहीं      लंबे      बांसों      में    तो  नहीं,
कहीं     बावन    ताशों    में    तो   नहीं,

कहीं बस में खिड़की वाले   सफ़र  में  तो नहीं,
कहीं दादी के कड़वे काढ़े  के असर में तो  नहीं,

कहीं  बैठे  हुए   यादों   में खो  जाने  में  तो  नहीं,
कहीं पिन्नी की पतंग बनाकर उड़ाने में तो नहीं,

कहीं     पगडंडी     पर     चलने   में  तो    नहीं,
कहीं तालाब में रपट कर  संभलने में तो  नहीं,

कहीं मछलियों को देर तक  देखने में तो  नहीं,
कहीं बेरी के  नीचे  बेर   समेटने   में  तो   नहीं,

नहीं,   नहीं,    कहीं    नहीं,
जिंदगी   यहीं  है,  बस यहीं,
आज इस पल को बना लो बस अपना,
पूरा हो जाएगा जिंदगी जीने का सपना....

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