जिंदगी कभी सहेली, कभी पहेली...
कभी लगती इतनी अपनी कि,
मैं खुद ही जिंदगी हूँ...
कभी इतनी पराई कि,
मैं इसे जानता ही नहीं !
कभी इतनी खुशियों का समंदर,
कि डूब मरता हूँ इसमें...
कभी एक मरुस्थल कि,
पानी की एक बूँद को तरस जाता हूँ !
कभी ये केवल दाल-रोटी की चिंता,
तो कभी एक हसीन स्वपन,
कि कोई चिंता ही नहीं !
जिंदगी कभी प्रेमिका बनकर,
अपने आगोश में ले लेती हैं..
तो कभी विरह की अग्नि में,
जलने को छोड़ देती है !
कभी झील सी शांत,
तो कभी सागर सी क्लांत..
समझ ना सका कि क्या है जिंदगी,
अब लगता है कि यह परिवर्तन ही जिंदगी है !
कभी लगती इतनी अपनी कि,
मैं खुद ही जिंदगी हूँ...
कभी इतनी पराई कि,
मैं इसे जानता ही नहीं !
कभी इतनी खुशियों का समंदर,
कि डूब मरता हूँ इसमें...
कभी एक मरुस्थल कि,
पानी की एक बूँद को तरस जाता हूँ !
कभी ये केवल दाल-रोटी की चिंता,
तो कभी एक हसीन स्वपन,
कि कोई चिंता ही नहीं !
जिंदगी कभी प्रेमिका बनकर,
अपने आगोश में ले लेती हैं..
तो कभी विरह की अग्नि में,
जलने को छोड़ देती है !
कभी झील सी शांत,
तो कभी सागर सी क्लांत..
समझ ना सका कि क्या है जिंदगी,
अब लगता है कि यह परिवर्तन ही जिंदगी है !

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