Friday, November 19, 2010

जिंदगी कभी सहेली, कभी पहेली...

जिंदगी कभी सहेली, कभी पहेली...

कभी लगती इतनी अपनी कि,
मैं खुद ही जिंदगी हूँ...
कभी इतनी पराई कि,
मैं इसे जानता ही नहीं !

कभी इतनी खुशियों का समंदर,
कि डूब मरता हूँ इसमें...
कभी एक मरुस्थल कि,
पानी की एक बूँद को तरस जाता हूँ !

कभी ये केवल दाल-रोटी की चिंता,
तो कभी एक हसीन स्वपन,
कि कोई चिंता ही नहीं !

जिंदगी कभी प्रेमिका बनकर,
अपने आगोश में ले लेती हैं..
तो कभी विरह की अग्नि में,
जलने को छोड़ देती है !

कभी झील सी शांत,
तो कभी सागर सी क्लांत..

समझ ना सका कि क्या है जिंदगी,
अब लगता है कि यह परिवर्तन ही जिंदगी है !

No comments: