Wednesday, March 23, 2011

आज और बचपन

वो खुशी कहाँ मिली
आज लाखों की दौलत भी पाकर
जो मिलती थी बचपन में
खुद पर खर्च करने के लिए दस पैसे मिल जाने से....

हुई ना वो तसल्ली
आज आलीशान घर में झूमर भी लगाकर
जो होती थी बचपन में
रेत के घरोंदों में टूटे काँच के टुकड़े लगाने से....

ना आई आज वैसी गहरी नींद
मखमली बिस्तर के आगोश में भी आकर
जैसी आती थी बचपन में
बिना तकिया, बिना चादर खेत में सो जाने से.....

ना उठी वो उमंग
आज शादी में लाखों रुपये भी बहाकर
जो उठती थी बचपन में
झूठ मूठ की शादी में गुड्डे-गुडियों को सजाने से....

आज मन हैं काले
घर के हर कोने में बत्तियाँ भी जलाकर
कभी होता था दिलों में उजाला
पूरी चौपाल पर एक डिबिया ही जलाने से.....

वो खुशी कहाँ मिली......

Saturday, March 5, 2011

कौन कहता है तन्हा हूँ मैं.....


कौन      कहता   है   तन्हा    हूँ   मैं,
हर वक़्त तो कोई ना कोई मेरे साथ है
दिन     में    जलता   हुआ    दिन   है
रात      में       झुलसती     रात     है

चारों      ओर    मेरे     अरमानों    के
मुरझाए    हुए    फूल     भी    तो   हैं
जो       चुभते      हैं     बहुत      तेज़
तेरी    यादों    के    शूल   भी    तो  हैं
जिसमें   मैं  खुद   बह   जाने  वाला हूँ
साथ   मेरे   आँसुओं   की   बरसात  है
कौन      कहता   है   तन्हा    हूँ    मैं,
हर वक़्त तो कोई ना कोई मेरे साथ है

जो    जलाती    है   मुझे    हर   पल
दर्द   की    वो   आग   भी     तो    है
जो    चाहता     है     मिटाना    मुझे
गमों   का   वो   शैलाब   भी   तो  है
जो    बन   गयी   है   जल  जाने  से
साथ    मेरे   ख़्वाबों   की    राख    है
कौन      कहता   है   तन्हा    हूँ   मैं,
हर वक़्त तो कोई ना कोई मेरे साथ है
दिन     में    जलता   हुआ    दिन    है
रात      में      झुलसती    रात      है....