वो खुशी कहाँ मिली
आज लाखों की दौलत भी पाकर
जो मिलती थी बचपन में
खुद पर खर्च करने के लिए दस पैसे मिल जाने से....
हुई ना वो तसल्ली
आज आलीशान घर में झूमर भी लगाकर
जो होती थी बचपन में
रेत के घरोंदों में टूटे काँच के टुकड़े लगाने से....
ना आई आज वैसी गहरी नींद
मखमली बिस्तर के आगोश में भी आकर
जैसी आती थी बचपन में
बिना तकिया, बिना चादर खेत में सो जाने से.....
ना उठी वो उमंग
आज शादी में लाखों रुपये भी बहाकर
जो उठती थी बचपन में
झूठ मूठ की शादी में गुड्डे-गुडियों को सजाने से....
आज मन हैं काले
घर के हर कोने में बत्तियाँ भी जलाकर
कभी होता था दिलों में उजाला
पूरी चौपाल पर एक डिबिया ही जलाने से.....
वो खुशी कहाँ मिली......
आज लाखों की दौलत भी पाकर
जो मिलती थी बचपन में
खुद पर खर्च करने के लिए दस पैसे मिल जाने से....
हुई ना वो तसल्ली
आज आलीशान घर में झूमर भी लगाकर
जो होती थी बचपन में
रेत के घरोंदों में टूटे काँच के टुकड़े लगाने से....
ना आई आज वैसी गहरी नींद
मखमली बिस्तर के आगोश में भी आकर
जैसी आती थी बचपन में
बिना तकिया, बिना चादर खेत में सो जाने से.....
ना उठी वो उमंग
आज शादी में लाखों रुपये भी बहाकर
जो उठती थी बचपन में
झूठ मूठ की शादी में गुड्डे-गुडियों को सजाने से....
आज मन हैं काले
घर के हर कोने में बत्तियाँ भी जलाकर
कभी होता था दिलों में उजाला
पूरी चौपाल पर एक डिबिया ही जलाने से.....
वो खुशी कहाँ मिली......

