Sunday, October 17, 2010

यादें हैं सच्ची परछाई...


बहुत    रात   गुजर   जाने  पर  भी,  जब   नींद   ना   आई,
दिल के किसी कोने में छिपी  यादों  ने, तब आवाज़  लगाई...

कोहरा     सा        हटने       लगा,       कुछ      चेहरों    से,
कुछ   चलती  -  फिरती   तस्वीरें,    दी     साफ     दिखाई...

कुछ यादों से बन गयी,  खुद-ब-खुद मुस्कुराहट की लकीरें,
कुछ      यादों      ने,       खूब       मेरी       आँखें       रुलाई...

कितना     नायाब     होता      है,     यादों      का    ख़ज़ाना,
लूट    लो    कितना    भी,       जब      साथ     हो    तन्हाई...

वो    भी    क्या    साया   है,  जो   बस  साथ  दे   उजालों में,
हर    जगह    साथ  रहती   हैं,  "दर्द" यादें  हैं  सच्ची परछाई...

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