आज जब देखता हूँ चारों ओर,
तो दूर-दूर तक अंत नहीं पाता,
उँची-उँची मीनारों का...
और जब देखता हूँ, जनसंख्या के आँकड़े,
तो हर वर्ष अनुपात सिकुड़ता जाता,
भारत में बेटियों का...
आज कंक्रीट की मीनारों पर,
हम अपनी सारी पूंजी लगा रहे हैं,
और कहते हैं, कि घर बना रहें हैं...
और गर्भ की बेटी को...
और गर्भ की बेटी को,
तकनीक से मिटा रहें हैं,
और सोचते हैं,
बड़े खर्च से मुक्ति पा रहें हैं...
एक पर लगाए धन को,
हम निवेश कहते हैं,
और दूसरे को मजबूरी....
कहीं यही तो नहीं,
विनाश की उल्टी धुरी...
वह दिन दूर नहीं, जब हम चारों ओर,
केवल कंक्रीट के जंगल खड़े पाएँगे...
हम उँची मीनारों पर, बड़े मकानों पर,
निवेश करते जाएँगे...
एक मकान रहने के लिए,
दस किराए के लिए बनाएँगे,
और गर्भ की बेटी को मारते रहेंगे...
और गर्भ की बेटी को मारते रहेंगे,
बचे दहेज का धन, इन मकानों पर लगायेंगे,
पर क्या,
बिना बेटियों के, इन बड़े मकानों में,
कभी कोई किल्कारी हम सुन पायेंगे ??
बढ़ती मीनारें और घटती बेटियाँ,
सचमुच चिंता की बात है,
एक से प्रक्रति ख़तरे में है,
दूसरा मानव सभ्यता का विनाश है...
आओ, दहेज प्रथा और भूर्ण हत्या को,
आप और हम समाज से मिटायें,
निवेश मीनारों पर नहीं, बेटियों पर करें,
उन्हें सबल और सुशिक्षित बनायें,
केवल चार दीवारी वाले दस मकान नहीं,
बस एक घर सुंदर सा सजायें,
जो हरी-भरी धरा हमें विरासत में मिली है,
भावी पीढ़ी को उसे वैसी ही सौंप जायें....
तो दूर-दूर तक अंत नहीं पाता,
उँची-उँची मीनारों का...
और जब देखता हूँ, जनसंख्या के आँकड़े,
तो हर वर्ष अनुपात सिकुड़ता जाता,
भारत में बेटियों का...
आज कंक्रीट की मीनारों पर,
हम अपनी सारी पूंजी लगा रहे हैं,
और कहते हैं, कि घर बना रहें हैं...
और गर्भ की बेटी को...
और गर्भ की बेटी को,
तकनीक से मिटा रहें हैं,
और सोचते हैं,
बड़े खर्च से मुक्ति पा रहें हैं...
एक पर लगाए धन को,
हम निवेश कहते हैं,
और दूसरे को मजबूरी....
कहीं यही तो नहीं,
विनाश की उल्टी धुरी...
वह दिन दूर नहीं, जब हम चारों ओर,
केवल कंक्रीट के जंगल खड़े पाएँगे...
हम उँची मीनारों पर, बड़े मकानों पर,
निवेश करते जाएँगे...
एक मकान रहने के लिए,
दस किराए के लिए बनाएँगे,
और गर्भ की बेटी को मारते रहेंगे...
और गर्भ की बेटी को मारते रहेंगे,
बचे दहेज का धन, इन मकानों पर लगायेंगे,
पर क्या,
बिना बेटियों के, इन बड़े मकानों में,
कभी कोई किल्कारी हम सुन पायेंगे ??
बढ़ती मीनारें और घटती बेटियाँ,
सचमुच चिंता की बात है,
एक से प्रक्रति ख़तरे में है,
दूसरा मानव सभ्यता का विनाश है...
आओ, दहेज प्रथा और भूर्ण हत्या को,
आप और हम समाज से मिटायें,
निवेश मीनारों पर नहीं, बेटियों पर करें,
उन्हें सबल और सुशिक्षित बनायें,
केवल चार दीवारी वाले दस मकान नहीं,
बस एक घर सुंदर सा सजायें,
जो हरी-भरी धरा हमें विरासत में मिली है,
भावी पीढ़ी को उसे वैसी ही सौंप जायें....

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