Friday, December 30, 2011

जाने कहाँ गये वो दिन...

जाने    कहाँ     गये     वो      दिन...

जब    घंटों    तालाब    के    किनारे,
बैठकर    मछलियाँ     निहारते   थे...
जब     स्कूल   से    आते      वक़्त,
सूखे कुँए में अपना नाम  पुकारते थे...
जब                बेपरवाह            हो,
भरी    दुपहरी    में पतंग  उड़ाते थे..
जब     गुल्ली    डंडे    के  खेल   में,
अपने  ही  दोस्त  को   पिदाते    थे...
जब     टॉफियाँ      और      ईमली,
खाने    से     अच्छी    लगती   थीं..
जब       हम      गुलेल   चलाते     थे,
और    दादी     पीछे    भगती    थी...
जब    मदारी     का     खेल     देखने,
दूर     तक        चले     जाते     थे...
जब       ट्यूब वेल   की    होद     में,
खूब      देर       तक      नहाते   थे..
जब    आँखों   में    पंछी  की  तरह,
उड़ने      के     सपने      होते     थे...
जब हम फिल्मों में किसी बच्चे  को,
रोता     देख     चुप     चुप   रोते   थे...

जाने       कहाँ       गये    वो   दिन...

जब      कोई   मनचाही   चीज़  खरीदने  के     लिए,
महीनों    गुल्लक    में     पैसे    जमा    करते  थे..
जब    मुहल्ले    में होने   वाली    राम लीला    में,
कभी राम, कभी लक्ष्मण, कभी वानर बना करते थे..
जब     बेर     और     जामुन     खाने    के     लिए,
दिन भर     के     लिए    घर    से  निकल  जाते थे...
जब     दिन     दिन    भर  कभी   कंचे, कभी ताश,
कभी    पहिया   चलाते   थे,   कभी  पंखे   उड़ाते थे..
जब    अपने     ही    घर    में    मलाई    चुराते   थे,
और      दादी     से     खूब    डाँट      मिलती    थी...
जब      गेंहूँ   की    लहराती    बालियों  में खेलते थे,
और    बालों    में     पीली      सरसों     झड़ती   थी...
जब           चित्रहार           और       रामायण     का,
कई               दिनों        तक     इंतजार  करते  थे...
जब      वीसीआर    पर    फिल्में     देखने  के  लिए,
मन                      बल्लियों             उछलते         थे...
जब             खेतों        पर       काम     करते      थे,
और        कोयल      आम     के    पेड़    पर गाती थी...
जब        खेत    पर   जाते   ही    भूख    लगती    थी,
और         रोटी       चटनी          खूब     भाती        थी....

जाने           कहाँ          गये            वो            दिन...

Friday, November 11, 2011

तेरे बिन कितना अधूरा हूँ मैं....

तेरे बिन कितना अधूरा  हूँ   मैं,
आज      है      जाना        मैंने..

के जैसे बाती   दिए   से     कोई
कोई   मोती   सीप   से     जैसे....
पानी   बिन    ज्यों       मछली,
तेरे   बिन   तड़पता    हूँ    ऐसे...

तेरे बिन जीना नहीं है  मुमकिन
आज       है        माना      मैंने....

तेरे बिन कितना अधूरा  हूँ    मैं,
आज     है      जाना           मैंने..

के     जैसे     दिल   से  धड़कन,
धरती     से       मौसम      जैसे...
जैसे         फूल       से    खुश्बू,
छवि      से        दर्पण     जैसे...

दुनिया नहीं है तेरी चाहत  बिन,
आज    है      पहचाना     मैंने...
तेरे   बिन  कितना अधूरा हूँ  मैं,
आज       है       जाना        मैंने..

Sunday, November 6, 2011

और प्यार रब है...

बूँदों   का  सागर   मे     मिल   जाना,
कलियों का सुबह  को  खिल   जाना,
हवा से   पत्तियों    का  हिल   जाना,
नज़र से मिलने पर नज़र दिल जाना,

ये   क्यूँ    होता    है ?
इसका क्या सबब है ?

बूँदें होती है सागर से मिलने को प्यासी,
इसलिए    वे  सागर  में मिल जाती हैं !
कलियों को  होती  है  भवरों  से  चाहत,
इसलिए   वे   सुबह  को  खिल जाती हैं !
हवा   छू   देती  है पत्तियों को प्यार से,
इसलिए   वे    झूमकर   हिल  जाती हैं !
प्यार   होना    होता   है  जब भी  कभी,
एक   दूसरे   से  नज़रें  मिल  जाती हैं !

यूँ  ही होता  है  प्यार,
और    प्यार   रब  है !


Monday, October 24, 2011

शुभ दीपावली

आप सबको खुशियाँ मिलें
है  मेरी  तमन्ना  दिली
मुबारक           आपको
ये     शुभ     दीपावली

फुलझड़ी     की     तरह
 आप खिलखिलाते  रहें
होठों  पर   नगमें  सदा
आप   गुनगुनाते  रहें

दुख     कभी   भी कोई
 ना आपके जीवन में आए
मिलें    हर  तरफ   बस
 आपको  बहारों के   साए

जीवन आपका महके
 जैसे गुलाब की कली
मुबारक           आपको
 ये   शुभ    दीपावली

हर    वक़्त   आपके
किस्मत   साथ  रहे
रहें   आप   जहाँ भी
आपकी मंज़िल पास रहे

जीवन में कोई गम
 ना  आपको   रुलाए
खुश   रहे   आपसे
सब अपने और पराए

मुस्कुरातें  रहें  आप
हर   राह,   हर गली
मुबारक           आपको
 ये    शुभ   दीपावली

Thursday, October 20, 2011

मुस्कुराने की वजह..

क्यूँ मुस्कुराने की वजह,
ढूंढता है दिल?
तेरे पास रोने की वजह नहीं है,
क्या यह काफ़ी नहीं..
जिस बात पर हँसना हो खिलखिलाकर,
तू मुस्कुराने से डरता है,
फिर कहता है,
जाती क्यूँ यह उदासी नहीं...
तेरे पास रोने की वजह नहीं है,
क्या यह काफ़ी नहीं..

Thursday, October 13, 2011

मुबारक जन्मदिन !!

बीते         खुशियों       में,
                                    तुम्हारा हर पल, हर दिन !
इन्हीं शुभकामनाओ सहित,
                                    तुम्हें मुबारक  जन्मदिन !!

जीवन    तुम्हारा,
                        गुलाबों सा  महके..
कदम       तुम्हारे,
                        कभी भी ना बहकें..

हर तमन्ना हर ख्वाहिश,
                                पूरी      हो          तुम्हारी..
बिना इंतजार किए तुम्हें,
                                 मिल जायें मंज़िलें  सारी..

तुम्हारे        लिए          हो,
                                   हर      काम      मुमकिन !
इन्हीं शुभकामनाओ सहित,
                                    तुम्हें मुबारक  जन्मदिन !!

(मेरे प्रिय दोस्त रवि के जन्मदिन के अवसर पर)

Thursday, September 29, 2011

भ्रष्टाचार...


एक बड़ा शोर है,
बादल घनघोर है,
इसने मचाया देखो,
आज हाहाकार है !!

देश रूपी पेड़ की,
जड़ो को जो खा रहा,
ये तो एक दीमक,
बड़ा ख़ूँख़ार है !!

ये एक राक्षस,
एक दानव जैसा,
देश को खाने के लिए,
बैठा तैयार है !!

गिरा दिया जिसने,
दुनिया की नज़रों से,
किया जिसने
हम सबको शर्मसार है !!

जानता हूँ मैं भी इसे,
जानते हैं आप भी,
ये और कोई नहीं है,
ये भ्रष्टाचार है !!


इसने है कपड़ा छीना,
इसने है छत छीनी,
इसने ग़रीबों का,
छीना नीवाला है !!

इसने बदले मेहनत के,
है मंहगाई दी,
जिसने ग़रीबो की,
कमर को तोड़ डाला है !!

अब ईद ईद सी ना,
दीवाली दीवाली लगे,
इसने तो निकाला,
सबका दीवाला है !!

इसने स्विस बैंक भरे,
अपने खाली बैंक करे,
और सारा दोष,
आम जनता पे डाला है !!

दो नहीं, सौ नहीं,
लाख या हज़ार नहीं,
इसने अरबों, करोड़ो का,
किया आर-पार है !!

जानता हूँ मैं भी इसे,
जानते हैं आप भी,
ये और कोई नहीं है,
ये भ्रष्टाचार है !!

 
जो साधते बस,
अपना ही मतलब,
ऐसे और नेता अब,
हमें नहीं चाहियें !!

हमे और हमारे देश को आज क्या चाहिए--

भरत सी ईमानदारी,
राम सा कल्याणकारी,
मोहम्मद साहब जैसा,
हितकारी हमें चाहिए !!

अशोक सा धर्माधिकारी,
अकबर सा भाईचारी,
वीरता का राणा सा,
पुजारी हमें चाहिए !!

खोखले वादे ना चाहें,
कोई झूठी आस नहीं,
अब एक ठोस,
शुरुआत हमें चाहिए!!

हमें लक्ष्मीबाई,
हमको भगतसिंह,
हमें गाँधी चाहिए,
सुभाष हमें चाहिए !!

आज फिर त्याग कर दे
जो अपने बेटे,
माँ के रूप में,
फिर पन्ना हमें चाहिए !!

देशहित में जो जान,
कर दे अपनी न्योछावर,
हर घर में एक,
अन्ना हमें चाहिए !!

घर घर में एक,
अन्ना हमें चाहिए !!

Monday, August 22, 2011

चेहरे पर भारत और भ्रष्टाचार

है "मेरा भारत महान" ये अभिमान,
उस दिन तक मुझ पर छाया था..
जब तक वो दुबला, कुम्हलाया चेहरा,
मेरे सामने ना आया था...

उसका आधा तन
निवस्त्र था,
एक फटा-पुराना चिथड़ा,
उसका सारा वस्त्र था...
उसके सारे शरीर में,
बहुत कम माँस शेष था..
वह हड्डियों का ढाँचा था,
खड़ा था, साँस ले रहा था,
बस यही उसमे विशेष था..
उसके पैर से,
रक्त की धार बह रही थी..
था जख्म बहुत पुराना,
उसकी हालत कह रही थी...
वह बार-बार रोटी माँगने के लिए,
हाथ फैलाता था...
कोई उसे गाली देता था,
तो कोई दुतकारता था...

उसकी दशा देख, मैंने उससे पूछा--

तू क्यूँ इस तरह,
निवस्त्र घूमता है...
क्या कुछ खाता नहीं है,
जो इस तरह सूखता है...
क्या तेरे माँ-बाप नहीं हैं,
जो माँगने के लिए हाथ फैलाता है..
यह जख्म नासूर बन जाएगा,
इस पर दवाई क्यूँ नहीं लगाता है...

इस पर वह बोला--

बाबू जी, मेरे पिता रोज कमाकर ही,
हमारे लिए रोटी लाते हैं..
पर जब वे बहुत बीमार पड़ते हैं,
उस दिन ही हम भीख माँगने आते हैं...
ऐसे कितने ही दिन आते हैं,
जब मैं भूखा सो जाता हूँ..
बाबू जी, दवाई खरीदने के लिए पैसे कहाँ,
मैं इस पर रोज मिट्टी लगाता हूँ...

वह बालक रोटी लेकर खाता रहा,
और मैं सोचता रहा---

हमारा सारा तंत्र,
कहाँ सो रहा है...
ग़रीबी मिटाने की हमारी योजनाओं का,
क्या हो रहा है..
ग़रीबी उन्मूलन के लिए,
जो अरबों की राशि आबंटित की जाती हैं..
जब इन ग़रीबों तक नहीं पहुँचती,
तो आख़िर कहाँ जाती हैं...

एक तरफ तो कितने ही भ्रष्ट,
नेता, राजा और कलमाडी हैं,
जो करोड़ों, अरबों रुपये खाते हैं..
दूसरी तरफ, कितने ही लोग,
रोज भूख से मरते हैं...
कितने ही बच्चे,
रोटी के लिए हाथ फैलाते हैं..

जिस दिन,
सोया तंत्र जागेगा, भ्रष्टाचार मिटेगा,
पारदर्शिता आएगी..
जिस दिन भूख, ग़रीबी और अभाव से,
किसी की जान नहीं जाएगी..
जिस दिन भीख माँगने के लिए,
कोई बालक हाथ नहीं फैलाएगा...
जिस दिन "जन लोक पाल" के लिए,
कोई अन्ना अनशन पर नहीं जाएगा...

उस दिन--
"मेरा भारत महान है" कहने की ज़रूरत ना होगी,
यह हर भारतवासी के चेहरे पर नज़र आएगा...

यह हर भारतवासी के चेहरे पर नज़र आएगा...

Thursday, August 4, 2011

भू-अधिग्रहण

वे मेरी जन्म-भूमि से,
मुझे जुदा करना चाहते हैं..

जिसके सौंधे, मटमैले आँचल में,
मैं पला बढ़ा;
जिसकी मिट्टी से मेरे जीवन का,
कलश गढ़ा;
जिसे मैने जल से कम,
पसीने से ज़्यादा सींचा;
जिसकी कोख से अन्न मिला मुझे,
सोने चाँदी अमरत सरीखा;
वे आज उसकी कीमत,
काग़ज़ के टुकड़ों में लगाते हैं...
वे मेरी जन्म-भूमि से,
मुझे जुदा करना चाहते हैं..



जिसकी गलियों में हम,
बचपन में खेले;
जिसमे मनाए मैने तीज़ त्योहार,
साथियों संग देखे मेले;
जिसकी यादों को सदा ह्रदय से लगाकर,
आने वाले कल के लिए बुने,
मैने सपने रुपहले;
वे उस गाँव और घर पर,
मंज़िलें खड़ी करना चाहते हैं....
वे मेरी जन्म-भूमि से,
मुझे जुदा करना चाहते हैं..

मैं जानना चाहता हूँ--

कितने नेता मुआवज़ा लेकर,
राजनीति छोड़ना चाहेंगे?
कितने अभिनेता फिल्में छोड़,
चिकित्सा में किस्मत आजमायेंगे?
कितने उद्योगपति उद्योग छोड़,
गाँवों में बस सकते हैं?
कितने क्रिकेटर क्रिकेट छोड़,
फुटबॉल में नाम कमा पाएँगे?

और वे मुझे
एक अंजान राह और मज़िल पर,
ज़बरदस्ती विदा करना चाहते हैं...
वे मेरी जन्म-भूमि से,
मुझे जुदा करना चाहते हैं...

Tuesday, July 26, 2011

मेरे मन तू आज उदास न हो...

मेरे मन तू आज उदास न हो...

आज   वो   कौन  सी चीज़ है,
जो    तेरे      पास     न    हो,
मेरे मन तू आज उदास न हो...

तेरे     पास    तेरा    प्यार   है,
एक हंसता, खेलता परिवार है;
वे   सारी     चीज़ें   हैं,
जिन्हे तू चाहता  था;
जिनके    लिए     तू,
पसीना   बहाता  था;

हाँ,   हो   सकता    है,
मंज़िल पर पहुँच कर,
तू  राहें  तलाशता हो--

ये    सच     है    कि-
मंज़िल पर  पहुँचना,
आसान     नहीं   है;
पर तू क्यूँ यह सोचता है कि-
मंज़िल   पर    पहुँच  कर,
तेरे पास कोई काम नहीं है...

जो किया है तूने हासिल,
उसे  कायम  रखना  भी,
एक  कठिन   रास्ता  है;
है         इंसान        वही,
जो गमों के बीच भी हंसता है...

तू  चला  चल  अपनी  राह  पर,
चाहे कोई भी तेरे साथ हो न हो..

मेरे मन तू आज उदास  न  हो...

Friday, July 15, 2011

सोचो - काश ऐसा होता...

सोचो - काश ऐसा होता,
हम बूढ़े पहले होते और बच्चे बाद में..

अपने जन्म के समय,
हममें से कुछ लेटे होते कब्र में,
और कुछ सने होते राख में..

लोग हमें लेकर जाते घर,
राम नाम सत्य कहते हुए..
घर की औरतें स्वागत करतीं हमारा,
छाती पीट-पीटकर रोते हुए...

घर जाते ही पड़ जाते हम,
कोने  में पड़ी चारपाई पर..
फिर हमारी दिनचर्या शुरू होती,
एक छड़ी के सहारे और दवाई पर...

कुछ साल बाद कोई बताता हमें,
कि अब हम जवान हो रहें हैं..
हमारे बाल जो पहले सफेद थे,
अब काले तमाम हो रहे हैं....

हमारी हरकतें फिर,
और बढ़ती जाती...
आस-पड़ोस की बुढ़ियों पर,
हमारी नज़र जाती...

घर वालों से करते सिफारिश,
फलाँ बुढ़िया से करो रिश्ते की बात...
इधर हम जवान हो रहे हैं,
वो भी जवान हो जाएगी, दो-चार साल बाद...

शादी के बाद,
शुरू होते कॉलेज के दिन..
सीधे एम. ए. बी. ए. में
होता एड्मिशन,

पढ़ाई करते कालिदास शेक्सपीएर से,
अ आ इ ई, ए बी सी डी तक..
धीरे धीरे छोड़ देते,
पान गुटखा सिगरेट बीड़ी तक..

जैसे जैसे घटती हमारी उम्र,
हमारी नादानियाँ और बढ़ती जाती...
समय बीतता गोली, पतंग में,
पॉपकिन चॉकलेट हमें खूब भाती..

उसके बाद छोड़ देते खाना,
बस दूध पर हम आ जाते...
और एक दिन अचानक,
माँ को होती प्रसव पीड़ा,
और हम गर्भ में समा जाते....

Tuesday, June 14, 2011

आज फिर ना जाने क्यूँ, तुम याद आ गये...

आज फिर   ना   जाने  क्यूँ,
तुम     याद       आ     गये...
गम मुझसे बिछड़  गये  थे,
आज फिर मिलने  आ गये...

आज      फिर       जिंदगी,
उदास   सी   लगने   लगी...
आज फिर कोई प्यास सी,
दिल   में     जगने    लगी...
आज फिर दिल की ज़मीन पर,
गम   के   बादल  छा गये....

आज फिर   ना   जाने  क्यूँ,
तुम     याद       आ     गये...

आज  फिर  तन्हा - तन्हा,
रहने  को  मन  करता है...
आज   फिर   आँखों   से,
आँसुओं का दावानल बहता है..
आज    फिर    दिल   में,
सैंकड़ों   गम  समा  गये...

आज फिर   ना   जाने  क्यूँ,
तुम     याद       आ     गये...

आज    फिर     लगता   है,
तुम मुझसे  जुदा  नहीं  हो...
दर्द में याद आता  है  खुदा,
कहीं तुम खुदा तो  नहीं हो....
आज फिर कश्मों-कश के हाथों,
खुद   को   हम   थमा गये.....


आज फिर ना  जाने  क्यूँ,
तुम    याद     आ     गये...
गम मुझसे बिछड़ गये थे,
आज फिर मिलने आ गये...

Saturday, May 28, 2011

जिंदगी आज फिर लगी बहुत खूबसूरत.....

जिंदगी आज फिर लगी  बहुत   खूबसूरत
सालों बाद सुकून  से  जो बैठा  मैं   तन्हा..
कई साल से जैसे जी रहा था दिनों को मैं,
आज  जिया  मैंने  दिन   का   हर  लम्हा...

कई  सवाल   आज   फिर,
अपने  दिल से पूछे  मैंने...
आज फिर सालों बाद,
अपने शौक के पौधे सीँचे मैंने...

आज फिर हर एक चीज़ को,
गौर से निहारा मैंने...
वक़्त की सीपियों से आज फिर,
यादों के मोती ढूँढे मैंने....

आज फिर अपनी धड़कनों के साज़ को,
देर  तक  सुना  मैंने...
आज फिर आने वाले कल के लिए,
एक  ख्वाब  बुना मैंने....

सोचता  रहा देर तक यही बात,
कि अब तक मैं जाने गुम था कहाँ...

जिंदगी आज फिर लगी बहुत  खूबसूरत
सालों बाद सुकून से जो बैठा  मैं   तन्हा..
कई साल से जैसे जी रहा था दिनों को मैं,
आज जिया  मैंने  दिन   का   हर  लम्हा...

Wednesday, May 4, 2011

वैसे मैं यारों उस पर मरता नहीं...

कुछ   भी  करने   को   दिल  अब   करता   नहीं
वैसे     मैं     यारों     उस     पर     मरता    नहीं...

हरपल     मेरे   ख्यालों      में    रहती     है   वो
मेरी    रगों   में   लहू    बनकर    बहती  है   वो
मेरी   हर   साँस   चलती  है उसका नाम  लेकर
मेरी     नींदों   में    ख्वाबों    में    रहती   है  वो
उसके  सिवा  कोई  ख्वाब  आँखों  से  गुज़रता  नहीं
वैसे   मैं     यारों     उस     पर      मरता    नहीं...

 रहता  हूँ  बेचैन  उसकी  एक  झलक   के लिए
आहें  भरता  हूँ  उन  ज़ुल्फो  की महक के लिए
पढ़ता  हूँ   उसे    ही    किताबों    में    अब   तो
करता हूँ इंतज़ार उसका शाम से शाम तक के लिए
जाने   कैसा   है  उसका खुमार जो उतरता नहीं
वैसे    मैं    यारों    उस      पर     मरता     नहीं...

रात-दिन,   सुबह-शाम   उसकी   याद   आती है
बस   वो   सिर्फ़   वो   ही   दिल   को    भाती  है
करता  हूँ   लाख   कोशिश    भुलाने   की    उसे
पर   मेरी    हर    कोशिश    बेकार    जाती    है
कोई पल ऐसा नहीं जब मैं उसके लिए तड़पता  नहीं
वैसे    मैं    यारों    उस    पर       मरता     नहीं...

December, 2000

Saturday, April 30, 2011

दर्द का समंदर कम नहीं होता......




दर्द      का      समंदर     कम     नहीं      होता,
बस    इतना    ही     है,   कि    मैं  नही  रोता !

ना  जाने  कौन   सी चीज़  मुझसे खो  गयी   है,
जिससे   बोझ   मन   का   हल्का  नहीं  होता !


जैसे     मुझे     रोज़       सज़ा    मिलती    है,
बस   कोई   मुक़दमा  मुकम्मिल  नहीं  होता !







मैं      जिंदगी       जीऊँगा       जी    भरकर,
देखता  हूँ,   मुझे   क्या   हासिल   नहीं  होता !

ए-वक़्त    अपनी   धार    और     तेज़    कर,
तेरे चाकू का मेरे इरादों पर असर नहीं  होता !

उस एक परवर के  आगे है  सब नत-मस्तक
एक पत्ता भी ना हिलता,  जो वो  नहीं  होता !

Monday, April 25, 2011

जिंदगी एक बड़ा ख्वाब सा है...

जिंदगी एक बड़ा ख्वाब सा है...

दुख भी हैं,
हैं सुख भी इसमें;
बहुत कुछ है,
कुछ भी नहीं वश में;
हैं गम बहुत,
तो हैं मुस्कुराहटें भी;
हैं नफ़रते अगर,
तो हैं चाहतें भी;

होता है इसमें जाने क्या-क्या,
यह एक अज़ाब सा है...
जिंदगी एक बड़ा ख्वाब सा है...

मेहनत है अगर,
तो है किस्मत भी;
है बदनसीबी अगर,
तो है रहमत भी;
राहें हैं लंबी अगर,
तो हैं मंज़िल भी;
हैं   ठोकरें अगर,
तो है साहिल भी;

कभी है अंधेरी रात सी,
तो कभी मेहताब सा है...
जिंदगी एक बड़ा ख्वाब सा है...

Saturday, April 16, 2011

क्या करूँ जो हर पल, याद तुम्हारी आती है...



तुमसे    ये      दूरी,      पागल    मुझे    बनाती   है
क्या    करूँ    जो   हर  पल,    याद  तुम्हारी  आती  है...

हर  पल,  हर   दिन,   एक     चुभन     सी     रहती  है
यूँ  तो   है   सब    कुछ,  पर   एक   घुटन सी  रहती है
अब कोई भी  बात,  ना  दिल  को   सुकून    दिलाती है
क्या   करूँ    जो  हर   पल,  याद  तुम्हारी   आती है...


एक -  एक   पल,  जाने   क्यूँ     साल    सा  लगता है
जीना  अब  तुम्हारे  बिन, एक  सवाल   सा  लगता है
सोचूँ जो खुद को तेरे बिन, जान  निकल  सी  जाती  है
क्या  करूँ  जो  हर   पल,   याद    तुम्हारी    आती  है.....

Wednesday, March 23, 2011

आज और बचपन

वो खुशी कहाँ मिली
आज लाखों की दौलत भी पाकर
जो मिलती थी बचपन में
खुद पर खर्च करने के लिए दस पैसे मिल जाने से....

हुई ना वो तसल्ली
आज आलीशान घर में झूमर भी लगाकर
जो होती थी बचपन में
रेत के घरोंदों में टूटे काँच के टुकड़े लगाने से....

ना आई आज वैसी गहरी नींद
मखमली बिस्तर के आगोश में भी आकर
जैसी आती थी बचपन में
बिना तकिया, बिना चादर खेत में सो जाने से.....

ना उठी वो उमंग
आज शादी में लाखों रुपये भी बहाकर
जो उठती थी बचपन में
झूठ मूठ की शादी में गुड्डे-गुडियों को सजाने से....

आज मन हैं काले
घर के हर कोने में बत्तियाँ भी जलाकर
कभी होता था दिलों में उजाला
पूरी चौपाल पर एक डिबिया ही जलाने से.....

वो खुशी कहाँ मिली......

Saturday, March 5, 2011

कौन कहता है तन्हा हूँ मैं.....


कौन      कहता   है   तन्हा    हूँ   मैं,
हर वक़्त तो कोई ना कोई मेरे साथ है
दिन     में    जलता   हुआ    दिन   है
रात      में       झुलसती     रात     है

चारों      ओर    मेरे     अरमानों    के
मुरझाए    हुए    फूल     भी    तो   हैं
जो       चुभते      हैं     बहुत      तेज़
तेरी    यादों    के    शूल   भी    तो  हैं
जिसमें   मैं  खुद   बह   जाने  वाला हूँ
साथ   मेरे   आँसुओं   की   बरसात  है
कौन      कहता   है   तन्हा    हूँ    मैं,
हर वक़्त तो कोई ना कोई मेरे साथ है

जो    जलाती    है   मुझे    हर   पल
दर्द   की    वो   आग   भी     तो    है
जो    चाहता     है     मिटाना    मुझे
गमों   का   वो   शैलाब   भी   तो  है
जो    बन   गयी   है   जल  जाने  से
साथ    मेरे   ख़्वाबों   की    राख    है
कौन      कहता   है   तन्हा    हूँ   मैं,
हर वक़्त तो कोई ना कोई मेरे साथ है
दिन     में    जलता   हुआ    दिन    है
रात      में      झुलसती    रात      है....

Tuesday, February 22, 2011

मुझे गम होता क्यूँ है???

ना जाने तेरे और किसी के हो जाने का,
मुझे गम होता क्यूँ है;
मैं जानता हूँ तू मेरी हो जाए मुमकिन नहीं,
फिर भी तेरी याद आने पर,
दिल रोता क्यूँ है;

तेरी नज़रों की भाषा हम समझ ना सके,
शायद उसी की सज़ा काट रहे हैं हम;
तेरे दिल का इरादा हम समझ ना सके,
शायद उसी की सज़ा काट रहे हैं हम;

पर मेरे बस में ही क्या था,
तेरा इरादा जाने बगैर भी तो,
चैन नहीं आता मुझको;
मैंने वही किया जो मेरे दिल ने,
करने के लिए मजबूर किया मुझको;

अंजाम भी वही हुआ,
जिसकी कुछ कुछ उम्मीद थी मुझे;
मेरा दिल टूटकर बिखर गया,
और हम पा ना सके तुझे;

हुआ बिल्कुल वैसा ही जैसी उम्मीद थी--
फिर भी दिल, तेरा मेरे हो जाने के,
झूठे सपने संजोता क्यूँ है;
ना जाने तेरे और किसी के हो जाने का,
मुझे गम होता क्यूँ है???

December, 1996

Monday, February 14, 2011

तो अच्छी लगती हो....

तुम मुस्कुराती  हो  तो  अच्छी  लगती हो

तुम   बोलती   हो   तो   झड़ते    हैं    फूल
तुम चुप हो जाती हो तो अच्छी  लगती हो

तुम पलके झुकाती हो तो लगती  हो  सुंदर
तुम पलके उठाती हो तो अच्छी लगती  हो

तुम   चलती   हो  तो  लुभाती   हो दिल को
तुम   रुक   जाती  हो  तो  अच्छी लगती हो

खुली   ज़ुल्फों    में    बनाती   हो    दीवाना
तुम जुल्फें  सजाती हो तो अच्छी लगती  हो

तुम पहनती हो सूट तो लगती हो बहुत खूब
तुम साडी में आती हो तो अच्छी लगती  हो

तुम    आती    हो    तो    आता   है    करार
तुम   शरमाती  हो  तो   अच्छी  लगती   हो

तुम   मुस्कुराती  हो  तो  अच्छी   लगती  हो

Tuesday, February 8, 2011

थी तमन्ना जिसकी वो जहाँ ख़त्म हुआ....


वो    प्यार    की    ज़मीन,   वो     मुहब्बत    का    आसमाँ    ख़त्म     हुआ

चल  रहा  था   जो  मुलाक़ातों   से       उनसे,     वो     कारवाँ   ख़त्म   हुआ

अब  बिखरे   हैं   तिनके  बस,   मेरा   वो   छोटा    सा   मका   ख़त्म    हुआ

घेर    लिया   है   खिजाओं   ने,    बहारों    का    वो   समाँ     ख़त्म    हुआ

महकती  थी  जिंदगी गुलाबों सी  जिसमें, महकता वो  गुलिस्ताँ  ख़त्म हुआ

जीने  को  तो जी रहे हैं दुनिया में, थी तमन्ना जिसकी  वो  जहाँ  ख़त्म हुआ


Saturday, January 22, 2011

नूर लेकर आया इक चेहरा

नूर लेकर आया इक चेहरा
लेकर आया खुशियों को संग

उसके आने जैसे
जीवन को मकसद मिल गया
बन गये रिश्ते अनेकों
अनेकों को रिश्ता मिल गया

उसके आने से जहाँ में
सारी उलझनों को मिल गया विराम
उस परी के हाथ जैसे जादू की छड़ी है
जिसके छूने से मिली हैं खुशियाँ तमाम

उसके हर स्पर्श से जैसे
पड़ती हैं, पड़ती हैं ठंडी बौछारें
उस इक फूल के खिलने से
आ गयीं हर तरफ़ बहारें

जीवन में इक नयी सुबह हुई है
भर गयी मनों में उमंग
नूर लेकर आया इक चेहरा,
लेकर आया खुशियों को संग

(मैंने यह कविता अपनी प्यारी बेटी यशिका के जन्म के बाद लिखी थी, जो २६ जनवरी को ५ (पाँच) वर्ष की हो रही है !)