वक़्त की सलाई से,
जब मैंने बीते दिनों की चादर बुनी,
अपने बेताब से मन की,
जब मैंने तन्हाई में बातें सुनी,
तो पाया, मैंने संघर्ष बहुत किया,
पर अपनी ख़्वाहिशों को पाता गया,
कुछ ख्वाहिशें अधूरी भी रहीं,
पर लगता है अब,
वह सब हुआ था सही,
हो सकता है उन ख़्वाहिशों को पूरा कर,
मैं अधूरा रह जाता,
उन ख़्वाहिशों की मंज़िलों से जुड़ता तो,
शायद यहाँ नहीं आ पाता,
जहाँ आ गया हूँ,
वही तो मंज़िल है नहीं,
मुझे बढ़ाते रहना है कदम,
मुझे जाना है अभी और कहीं,
यही है ज़िंदगी,
जो संघर्ष और ख़्वाहिशों में चलती रहेगी,
वक़्त की सलाई,
आने वाले दिनों की चादर बुनेगी....

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