'दर्द' ने देखा, जाँचा, परखा है जो अब तक,
बस यही कि ज़िंदगी ही है, ज़िंदगी का सच !
चलती रहती हैं यूँही धड़कनें और साँसें,
बीत जाता है एक दिन, रोज़ बस !
इस पर किसी का अख़्तियार कहाँ,
मिल जाए, बिछड़ जाए, कहाँ, कौन, कब !
था बचपन, तो टॉफियाँ भी ख़ूब भाती थीं,
रहा रसगुल्ले में भी कहाँ, वो लुत्फ़ अब !
सबको मरहम लगाने का सलीका तब ही आया,
ख़ुद दिल पे खाया गहरा, ज़ख्म जब !
बस यही कि ज़िंदगी ही है, ज़िंदगी का सच !
चलती रहती हैं यूँही धड़कनें और साँसें,
बीत जाता है एक दिन, रोज़ बस !
इस पर किसी का अख़्तियार कहाँ,
मिल जाए, बिछड़ जाए, कहाँ, कौन, कब !
था बचपन, तो टॉफियाँ भी ख़ूब भाती थीं,
रहा रसगुल्ले में भी कहाँ, वो लुत्फ़ अब !
सबको मरहम लगाने का सलीका तब ही आया,
ख़ुद दिल पे खाया गहरा, ज़ख्म जब !

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