Monday, September 27, 2010

ज़िंदगी ही है ज़िंदगी का सच......

'दर्द' ने  देखा,  जाँचा,  परखा  है  जो अब  तक,
बस  यही  कि  ज़िंदगी  ही  है, ज़िंदगी का सच !

चलती   रहती   हैं   यूँही  धड़कनें   और   साँसें,
बीत    जाता    है    एक     दिन,   रोज़     बस !

इस     पर    किसी     का     अख़्तियार    कहाँ,
मिल   जाए,   बिछड़   जाए,   कहाँ,  कौन,  कब !

था     बचपन,   तो  टॉफियाँ  भी  ख़ूब  भाती  थीं,
रहा   रसगुल्ले   में   भी   कहाँ,  वो  लुत्फ़  अब !

सबको मरहम लगाने का सलीका तब ही आया,
ख़ुद   दिल    पे   खाया    गहरा,   ज़ख्म    जब !

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