Saturday, November 6, 2010

दिल चाहे ना चाहे, रुखसत लोग हो जाते हैं...

दिल  चाहे  ना चाहे,  रुखसत लोग  हो जाते हैं,
उठते  नहीं  कभी  भी, गहरी  नींद सो जाते हैं !

बाँध जाते हैं सभी को, बस  यादों की ज़ंजीरों में;
मिलते  हैं  फिर  हमको,  बस  वे  तस्वीरों में;
मुस्काती  तस्वीरों  को,  हम देख  रो  जाते हैं;
दिल  चाहे  ना चाहे, रुखसत लोग हो जाते हैं....

नज़र आयें जो हमें, तो उन्हें आवाज़ दे बुला लें;
एक  बार  फिर उन्हें, अपने  गले हम लगा लें;
पर सुनते हैं किसकी बातें, एक बार जो जाते हैं;
दिल  चाहे  ना चाहे, रुखसत  लोग हो जाते हैं....

एक ना एक दिन, सबको इस दुनिया से जाना है;
हर  इन्सा एक दिन जग से, हो जाता बेगाना है;
ना  जाने  कैसे-कैसे,  हम दिल को समझाते हैं;
दिल  चाहे  ना चाहे, रुखसत  लोग हो जाते  हैं....
उठते  नहीं  कभी  भी, गहरी  नींद  सो  जाते हैं.....


1 comment:

Anonymous said...

na chahte hue bhi aankh nam ho aati hai
aapki kavita rukhsat hue logon ki
yaadon ko taaza kar jaati hai

Renu