Friday, November 11, 2011

तेरे बिन कितना अधूरा हूँ मैं....

तेरे बिन कितना अधूरा  हूँ   मैं,
आज      है      जाना        मैंने..

के जैसे बाती   दिए   से     कोई
कोई   मोती   सीप   से     जैसे....
पानी   बिन    ज्यों       मछली,
तेरे   बिन   तड़पता    हूँ    ऐसे...

तेरे बिन जीना नहीं है  मुमकिन
आज       है        माना      मैंने....

तेरे बिन कितना अधूरा  हूँ    मैं,
आज     है      जाना           मैंने..

के     जैसे     दिल   से  धड़कन,
धरती     से       मौसम      जैसे...
जैसे         फूल       से    खुश्बू,
छवि      से        दर्पण     जैसे...

दुनिया नहीं है तेरी चाहत  बिन,
आज    है      पहचाना     मैंने...
तेरे   बिन  कितना अधूरा हूँ  मैं,
आज       है       जाना        मैंने..

Sunday, November 6, 2011

और प्यार रब है...

बूँदों   का  सागर   मे     मिल   जाना,
कलियों का सुबह  को  खिल   जाना,
हवा से   पत्तियों    का  हिल   जाना,
नज़र से मिलने पर नज़र दिल जाना,

ये   क्यूँ    होता    है ?
इसका क्या सबब है ?

बूँदें होती है सागर से मिलने को प्यासी,
इसलिए    वे  सागर  में मिल जाती हैं !
कलियों को  होती  है  भवरों  से  चाहत,
इसलिए   वे   सुबह  को  खिल जाती हैं !
हवा   छू   देती  है पत्तियों को प्यार से,
इसलिए   वे    झूमकर   हिल  जाती हैं !
प्यार   होना    होता   है  जब भी  कभी,
एक   दूसरे   से  नज़रें  मिल  जाती हैं !

यूँ  ही होता  है  प्यार,
और    प्यार   रब  है !