Tuesday, February 18, 2014

जीवन के आगामी पथ पर

 ज्वाला सी, रक्त-रंजित,
कल की स्मरतियाँ,
कितनी ही बार,
समा लेना चाहती हैं,
अपने में,
मेरे आज को...
दशकों से दबी,
अंतर्मन की एक पीड़ा,
बार-बार उभरती,
कुचलकर,
मेरे मनरूपी आँगन को,
आकर खड़ी होती,
अचानक,
करना चाहती है जैसे,
एक क्षण में,
सर्वस्व समाप्त...
और कहती,
कि चल उठ तू,
फिर से दिखा,
तुझमें है जीवट,
है तू,
मुझसे विशाल,
हरा कर,
फिर से,
अपने मान के आँगन को
मैं घबराकर,
सिहर उठता हूँ,
काँप जाता,
मेरा रोम, रोम,
फिर जुटाता हूँ,
हिम्मत,
खड़ा होता हूँ,
एक अडिग चट्टान सा,
और कहता उससे,
उसकी आँखों में आँखें डाल,
रोकना संभव नहीं,
मैं इसी भाँति,
बढ़ूंगा,
ना रुकुंगा,
जीवन के,
आगामी पथ पर,
निरंतर.....

Sunday, February 9, 2014

ये बारिश का मौसम

यारों, ये बारिश का मौसम, ये रिम झिम, झिम झिम,
याद दिला रहा है, वो अपने पुराने, मस्ती भरे दिन...
वो अजीबोग़रीब शर्ते,
वो ठहाके, वो एक दूसरे को छेड़ना,
बात बात पर लड़ना, झगड़ना,
फिर मान जाना, मना लेना,
साथ में भूखे रहना,
खाना, पीना, हर पल को जीना,
सुबह से शाम तक,
साथ करना मेहनत, बहाना पसीना,

फिर भी लगना कि, जल्दी बीत गया आज दिन,
यारों, ये बारिश का मौसम, ये रिम झिम झिम झिम,
याद दिला रहा है, वो अपने पुराने, मस्ती भरे दिन...

वो अपने बारिश के दिन,
फिर से लौटाए कोई,
हम से सब कुछ ले ले,
पर हमें साथ ले आए कोई,
जिंदगी गुज़रे उन्हीं,
शर्तो, झगड़ों, मस्ती, ठहाकों में,
और हमें फिर कभी,
जुदा ना कर पाए कोई,

यारों, जिंदगी, जिंदगी नहीं लगती तुम बिन,
यारों, ये बारिश का मौसम, ये रिम झिम झिम झिम,
याद दिला रहा है, वो अपने पुराने मस्ती भरे दिन...

Sunday, February 2, 2014

है कितना तुम्हें याद किया मैंने....

है कितना तुम्हें याद किया मैंने,
ये राहें, ये पेड़, ये फूल, ये फ़िज़ायें,
सब हैं गवाह इसके,
इनसे पूछना कभी कि,
इन्होंने कितनी ही बार देखा है,
मेरे ख्यालों में तुम्हें,
मेरा हाथ थामकर,
रखकर मेरे काँधे पर अपना सिर,
इनके सामने से गुज़रते हुए.....

पूछना इस झील के,
थमे नीले पानी से,
कितनी बार अक्श उभरा,
तुम्हारा इसमें,
और मैंने देखीं हैं इसमें,
तुम्हारी झील सी गहरी आँखें,
मेरे प्यार के काजल से,
सजते, सँवरते हुए....

इस गुलाब की पखुड़ियों पर,
अरसे से ठहरा,
एक हवा का झोका,
बताएगा तुम्हें कि,
कितनी बार रुकी हैं,
मेरी साँसें, मेरी धड़कन,
जब जब छुआ है,
मैंने इन पंखुड़ियों को,
धीरे से,
तुम्हारे गुलाबी लब समझकर,
सकुचाते हुए, डरते हुए....

है कितना तुम्हें याद किया मैंने....