बस इतना ही है, कि मैं नही रोता !
ना जाने कौन सी चीज़ मुझसे खो गयी है,
जिससे बोझ मन का हल्का नहीं होता !
जैसे मुझे रोज़ सज़ा मिलती है,
बस कोई मुक़दमा मुकम्मिल नहीं होता !
मैं जिंदगी जीऊँगा जी भरकर,
देखता हूँ, मुझे क्या हासिल नहीं होता !
ए-वक़्त अपनी धार और तेज़ कर,
तेरे चाकू का मेरे इरादों पर असर नहीं होता !
उस एक परवर के आगे है सब नत-मस्तक
एक पत्ता भी ना हिलता, जो वो नहीं होता !
ना जाने कौन सी चीज़ मुझसे खो गयी है,
जिससे बोझ मन का हल्का नहीं होता !
जैसे मुझे रोज़ सज़ा मिलती है,
बस कोई मुक़दमा मुकम्मिल नहीं होता !
मैं जिंदगी जीऊँगा जी भरकर,
देखता हूँ, मुझे क्या हासिल नहीं होता !
ए-वक़्त अपनी धार और तेज़ कर,
तेरे चाकू का मेरे इरादों पर असर नहीं होता !
उस एक परवर के आगे है सब नत-मस्तक
एक पत्ता भी ना हिलता, जो वो नहीं होता !

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