जाने कहाँ गये वो दिन...
जब घंटों तालाब के किनारे,
बैठकर मछलियाँ निहारते थे...
जब स्कूल से आते वक़्त,
सूखे कुँए में अपना नाम पुकारते थे...
जब बेपरवाह हो,
भरी दुपहरी में पतंग उड़ाते थे..
जब गुल्ली डंडे के खेल में,
अपने ही दोस्त को पिदाते थे...
जब टॉफियाँ और ईमली,
खाने से अच्छी लगती थीं..
जब हम गुलेल चलाते थे,
और दादी पीछे भगती थी...
जब मदारी का खेल देखने,
दूर तक चले जाते थे...
जब ट्यूब वेल की होद में,
खूब देर तक नहाते थे..
जब आँखों में पंछी की तरह,
उड़ने के सपने होते थे...
जब हम फिल्मों में किसी बच्चे को,
रोता देख चुप चुप रोते थे...
जाने कहाँ गये वो दिन...
जब कोई मनचाही चीज़ खरीदने के लिए,
महीनों गुल्लक में पैसे जमा करते थे..
जब मुहल्ले में होने वाली राम लीला में,
कभी राम, कभी लक्ष्मण, कभी वानर बना करते थे..
जब बेर और जामुन खाने के लिए,
दिन भर के लिए घर से निकल जाते थे...
जब दिन दिन भर कभी कंचे, कभी ताश,
कभी पहिया चलाते थे, कभी पंखे उड़ाते थे..
जब अपने ही घर में मलाई चुराते थे,
और दादी से खूब डाँट मिलती थी...
जब गेंहूँ की लहराती बालियों में खेलते थे,
और बालों में पीली सरसों झड़ती थी...
जब चित्रहार और रामायण का,
कई दिनों तक इंतजार करते थे...
जब वीसीआर पर फिल्में देखने के लिए,
मन बल्लियों उछलते थे...
जब खेतों पर काम करते थे,
और कोयल आम के पेड़ पर गाती थी...
जब खेत पर जाते ही भूख लगती थी,
और रोटी चटनी खूब भाती थी....
जाने कहाँ गये वो दिन...
जब घंटों तालाब के किनारे,
बैठकर मछलियाँ निहारते थे...
जब स्कूल से आते वक़्त,
सूखे कुँए में अपना नाम पुकारते थे...
जब बेपरवाह हो,
भरी दुपहरी में पतंग उड़ाते थे..
जब गुल्ली डंडे के खेल में,
अपने ही दोस्त को पिदाते थे...
जब टॉफियाँ और ईमली,
खाने से अच्छी लगती थीं..
जब हम गुलेल चलाते थे,
और दादी पीछे भगती थी...
जब मदारी का खेल देखने,
दूर तक चले जाते थे...
जब ट्यूब वेल की होद में,
खूब देर तक नहाते थे..
जब आँखों में पंछी की तरह,
उड़ने के सपने होते थे...
जब हम फिल्मों में किसी बच्चे को,
रोता देख चुप चुप रोते थे...
जाने कहाँ गये वो दिन...
जब कोई मनचाही चीज़ खरीदने के लिए,
महीनों गुल्लक में पैसे जमा करते थे..
जब मुहल्ले में होने वाली राम लीला में,
कभी राम, कभी लक्ष्मण, कभी वानर बना करते थे..
जब बेर और जामुन खाने के लिए,
दिन भर के लिए घर से निकल जाते थे...
जब दिन दिन भर कभी कंचे, कभी ताश,
कभी पहिया चलाते थे, कभी पंखे उड़ाते थे..
जब अपने ही घर में मलाई चुराते थे,
और दादी से खूब डाँट मिलती थी...
जब गेंहूँ की लहराती बालियों में खेलते थे,
और बालों में पीली सरसों झड़ती थी...
जब चित्रहार और रामायण का,
कई दिनों तक इंतजार करते थे...
जब वीसीआर पर फिल्में देखने के लिए,
मन बल्लियों उछलते थे...
जब खेतों पर काम करते थे,
और कोयल आम के पेड़ पर गाती थी...
जब खेत पर जाते ही भूख लगती थी,
और रोटी चटनी खूब भाती थी....
जाने कहाँ गये वो दिन...

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