Thursday, August 4, 2011

भू-अधिग्रहण

वे मेरी जन्म-भूमि से,
मुझे जुदा करना चाहते हैं..

जिसके सौंधे, मटमैले आँचल में,
मैं पला बढ़ा;
जिसकी मिट्टी से मेरे जीवन का,
कलश गढ़ा;
जिसे मैने जल से कम,
पसीने से ज़्यादा सींचा;
जिसकी कोख से अन्न मिला मुझे,
सोने चाँदी अमरत सरीखा;
वे आज उसकी कीमत,
काग़ज़ के टुकड़ों में लगाते हैं...
वे मेरी जन्म-भूमि से,
मुझे जुदा करना चाहते हैं..



जिसकी गलियों में हम,
बचपन में खेले;
जिसमे मनाए मैने तीज़ त्योहार,
साथियों संग देखे मेले;
जिसकी यादों को सदा ह्रदय से लगाकर,
आने वाले कल के लिए बुने,
मैने सपने रुपहले;
वे उस गाँव और घर पर,
मंज़िलें खड़ी करना चाहते हैं....
वे मेरी जन्म-भूमि से,
मुझे जुदा करना चाहते हैं..

मैं जानना चाहता हूँ--

कितने नेता मुआवज़ा लेकर,
राजनीति छोड़ना चाहेंगे?
कितने अभिनेता फिल्में छोड़,
चिकित्सा में किस्मत आजमायेंगे?
कितने उद्योगपति उद्योग छोड़,
गाँवों में बस सकते हैं?
कितने क्रिकेटर क्रिकेट छोड़,
फुटबॉल में नाम कमा पाएँगे?

और वे मुझे
एक अंजान राह और मज़िल पर,
ज़बरदस्ती विदा करना चाहते हैं...
वे मेरी जन्म-भूमि से,
मुझे जुदा करना चाहते हैं...

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