इस बार जब मैं गाँव गया,मिट्टी में खेलने को मचल उठा,
मेरा बीता हुआ बचपन,
देखकर गाँव के टूटे घर का,
वो कच्ची मिट्टी का आँगन !
ठहर गयी कुछ देर के लिए,
उस मुंडेर पर मेरी नज़र,
जिसपर खेलती थीं चिड़ियाँ,
और उनमें होती थी अनबन !
जिसपर लेटकर गुज़ारी थीं,
गर्मियों की कितनी ही रातें,
उस कच्ची छत पर भरी दुपहरी में,
लेटने को हो आया था मन !
हमारी सुनहली गाय का,
आँगन में खूँटा अभी भी था,
बस नहीं थी वो सीधी गाय,
और उसकी घंटी की टन-टन !
नज़रें उस बूढ़े बाबा को,
चौपाल पर तलाशती थीं,
जिससे था मेरा, रात का,
और कहानी का, अटूट बंधन !
मुझे बचपन के उन साथियों का,
गली में झुंड नहीं मिला,
जिनसे होती थी रोज लड़ाई,
जिनके बिना, लगता नहीं था मन !
मैं पक्की सड़कों में देर तक,
कच्ची पगडंडियाँ ढूंढता रहा,
जो दब गयी थीं उनमें वैसे ही,
जैसे जवानी में बचपन !
2 comments:
Dear, Gaon ki yaad dila di apne...
Bachpan ki suhani yadon ke bikhre motiyon ko itni khoobsurti se piroya ki wahin lot jaane ko dil chahta hai
Manren
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