Wednesday, September 29, 2010

इस बार जब मैं गाँव गया..

इस   बार   जब   मैं   गाँव  गया,

मिट्टी में  खेलने को मचल उठा,
मेरा    बीता     हुआ    बचपन,
देखकर  गाँव  के  टूटे  घर का,
वो  कच्ची  मिट्टी  का  आँगन !

ठहर  गयी   कुछ  देर के लिए,
उस   मुंडेर   पर   मेरी   नज़र,
जिसपर  खेलती  थीं   चिड़ियाँ,
और  उनमें  होती  थी अनबन !

जिसपर    लेटकर    गुज़ारी  थीं,
गर्मियों   की   कितनी   ही   रातें,
उस कच्ची छत पर भरी दुपहरी में,
लेटने   को   हो   आया   था   मन !

हमारी     सुनहली     गाय     का,
आँगन   में    खूँटा  अभी   भी था,
बस  नहीं   थी   वो   सीधी   गाय,
और  उसकी  घंटी  की  टन-टन !

नज़रें    उस    बूढ़े    बाबा    को,
चौपाल     पर     तलाशती   थीं,
जिससे    था    मेरा,   रात   का,
और  कहानी  का,  अटूट  बंधन !


मुझे  बचपन  के  उन साथियों का,
गली     में     झुंड    नहीं     मिला,
जिनसे    होती   थी    रोज   लड़ाई,
जिनके  बिना, लगता नहीं था मन !

मैं   पक्की   सड़कों   में   देर   तक,
कच्ची    पगडंडियाँ    ढूंढता    रहा,
जो   दब   गयी   थीं   उनमें वैसे ही,
जैसे     जवानी      में       बचपन !

2 comments:

Anonymous said...

Dear, Gaon ki yaad dila di apne...

Anonymous said...

Bachpan ki suhani yadon ke bikhre motiyon ko itni khoobsurti se piroya ki wahin lot jaane ko dil chahta hai

Manren