दूसरों के चेहरे पर भी, आ जाती है रौनक,
हमारा लगता ही क्या है, मुस्कुराने में !
और नहीं तो कम से कम, दिल से तो पास रहें,
रखा ही क्या है, यूँ दूरियाँ बनाने में !
हटा दो चश्मा -ए- मतलब -ओ - मौक़ापरस्ती,
देखो फिर, लुत्फ़ है कितना, मिलने - मिलाने में !
करो मुहब्बत, और उसे कम ना होने दो,
यूँ ही बीत जाए ना ज़िंदगी, रूठने-मनाने में,
है खुशी, तुम्हारे ही इर्द - गिर्द, ज़रा देखो,
ख़ुदा ने छिपा के थोड़े ही रखी है, तहख़ाने में !
हमारा लगता ही क्या है, मुस्कुराने में.....
हमारा लगता ही क्या है, मुस्कुराने में !
और नहीं तो कम से कम, दिल से तो पास रहें,
रखा ही क्या है, यूँ दूरियाँ बनाने में !
हटा दो चश्मा -ए- मतलब -ओ - मौक़ापरस्ती,
देखो फिर, लुत्फ़ है कितना, मिलने - मिलाने में !
करो मुहब्बत, और उसे कम ना होने दो,
यूँ ही बीत जाए ना ज़िंदगी, रूठने-मनाने में,
है खुशी, तुम्हारे ही इर्द - गिर्द, ज़रा देखो,
ख़ुदा ने छिपा के थोड़े ही रखी है, तहख़ाने में !
हमारा लगता ही क्या है, मुस्कुराने में.....

2 comments:
Bahut Badhiya,
Thanks
Jitendra
Apki sunder kavita aur urdu shabd gyan- kya baat hai. Kahan chupa rakha tha ye sab. Lucky man! hum to Bahi Khate me hi kho gaye lagte hain.
Post a Comment