Saturday, April 30, 2016

खाली से लम्हें पड़े हैं यहीं पर




खाली से लम्हें पड़े हैं यहीं पर थोड़े से छत पर, थोड़े ज़मीं पर अलसायी सी धूप उतरी है आँगन, अनमनी सी छाया छिप गयी कहीं पर परिंदें चोंच में तिनके लिए जा रहे हैं ज़रूर घरोंदे बना रहे हैं कहीं पर सुस्त सी दोपहर ने दे दी है दस्तक, रुक गयी है पुरवईया ठिठककर कहीं पर नयी कोपलो से फिर सज़ा गया है पीपल पर वो नटखट बचपन रह गया कहीं पर..

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