Friday, May 4, 2012

जाते...जाते...

एक और मुलाक़ात के लिए,
बेताबी को कई गुना बढ़ा गये,
इस अंदाज में कह गये वो अलविदा,
जाते...जाते...

जब साथ बैठे थे,
तो जैसे कोई बात नहीं थी,
पूरी तरह जैसे दिल में गये समा,
जाते...जाते...

एक आग थी जैसे,
कहीं दबकर सुलग रही थी,
वो उस आग में उठाके गये धुआँ,
जाते...जाते...

जिंदगी जैसे एक बंद कमरा थी,
घुट रही थी,
वे बना गये इसे खुला आसमां,
जाते...जाते...

अंजान था जैसे अब तक,
सचमुच जिंदगी से,
वे समझा गये इसका फलसफा,
जाते...जाते...

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