ज्वाला सी, रक्त-रंजित,
कल की स्मरतियाँ,
कितनी ही बार,
समा लेना चाहती
हैं,
अपने में,
मेरे आज को...
दशकों से दबी,
अंतर्मन
की एक पीड़ा,
बार-बार उभरती,
कुचलकर,
मेरे मनरूपी आँगन को,
आकर खड़ी होती,
अचानक,
करना चाहती है जैसे,
एक क्षण में,
सर्वस्व
समाप्त...
और कहती,
कि चल उठ
तू,
फिर से दिखा,
तुझमें है जीवट,
है तू,
मुझसे विशाल,
हरा कर,
फिर से,
अपने मान के
आँगन को…
मैं घबराकर,
सिहर उठता हूँ,
काँप जाता,
मेरा रोम, रोम,
फिर जुटाता हूँ,
हिम्मत,
खड़ा होता हूँ,
एक अडिग चट्टान
सा,
और कहता उससे,
उसकी आँखों में आँखें
डाल,
रोकना संभव नहीं,
मैं इसी भाँति,
बढ़ूंगा,
ना रुकुंगा,
जीवन के,
आगामी पथ पर,
निरंतर.....
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